Sunday, 9 February 2025

शल, शौल, साही

🦔साही, शौल🦔
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कुमाउँनी-गढ़वाली में साही (porcupine) के लिए प्रचलित शब्द सौल, शौल, शौव, शौलु को संस्कृत 'शल/शल्लक' से व्युत्पन्न मानें। शलली शल के काँटे को भी कहा जाता है, शल को भी।
श्वावित् शल का पर्याय है। श्वानं विध्यतीति श्वावित्। 
जो अपने काँटों से श्वान (कुत्ते) को भी मार दे, वह श्वावित।
"श्वावित्तु शल्यस्तल्लोम्नि शलली शललं शलम्"। (अमर:) 
श्वावित् वह पशु है जिसके लोम (रोएँ) शल्य (काँटे) के हों । उसके नाम शलली, शलल और शल भी हैं।

शल्य का अर्थ है काँटा, कुरेदने -फाड़ने वाला कोई उपकरण।महाभारत युद्ध में महारथी कर्ण के सारथी का नाम शल्य था। कहते हैं इसका कारण यह था कि वह कर्ण के सामने उसकी वीरता का बखान करते-करते एक तड़का अवश्य लगा लेता था कि यों तो आप बलवान हैं, किंतु अर्जुन में एक विशेषता यह भी है...! यह बात कर्ण को काँटे जैसी चुभती थी, इसलिए शल्य यथा नाम तथा गुण था।

शल के लिए हिंदी में प्रचलित साही, सेही, सेई संस्कृत 'सेधा' से हैं। सेधा > सेधी > साही/सेही/सेई।
साही के काँटे की यज्ञोपवीत‌ और विवाह के समय आवश्यकता होती थी। मिथिला में यज्ञोपवीत में इसे वटुक की शिखा में लपेटा जाता है और विवाह में सिन्दूर देने के पहले इससे कन्या की माँग दो भागों में बाँटकर कोरी जाती है। कुमाऊँ में भी यज्ञोपवीत संस्कार के समय वटुक के द्वारा जाने अनजाने अभक्ष-भक्षण के दोष को दूर करने के लिए सौलकान (शल का काँटा) नाभि में चुभाया जाता था।
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