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[आज एक पत्रिका में लद्दाख में रहने वाली एक बौद्ध महिला के बारे में पढ़ रहा था जो प्रश्न कर्ता के मन में उठे सवालों का उत्तर ठीक-ठीक दे देती है। लेखिका का कहना था कि ऐसा दावा करने वाले दैवी शक्ति वाले (oracle) अनेक लोग हिमालय क्षेत्र के विभिन्न स्थानों में मिल जाएँगे। इसे पढ़कर मुझे अपने साथ घटी एक घटना याद आ गई।
मैं नास्तिक नहीं पर भूत-प्रेत, जागर-पूछ, झाड़-फूँक जैसी बातों पर मुझे कभी कोई विश्वास नहीं दिला पाया। इस घटना का कोई तर्कसंगत/वैज्ञानिक कारण शायद रहा होगा जिसे मैं आज तक नही समझ पाया हूँ। जो हो, यह संस्मरण एकदम सच्चा है। कारण विश्लेषण का काम मैं पाठकों पर छोड़ रहा हूँ।]
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बात कोई ४५ साल पुरानी है | पड़ौस में एक पर्वतीय मित्र रह रहे थे जो राज्यसभा सचिवालय में किसी उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे। उन्हें संसदीय समिति की बैठक में बेंगलुरु जाना था | उनकी पत्नी कुछ अस्वस्थ थीं, सो जाने से पहले उनकी ओर से एक औपचारिक-सा अनुरोध हमसे किया गया कि 'कभी बच्चों के हाल-चाल पूछ लेना', और वैसा ही औपचारिक-सा हमारा उत्तर कि 'फिक्र न करें...’
दो-तीन दिन बाद सवेरे उनके दो छोटे बच्चे आते हैं, 'अंकल, माँ की तबीयत ठीक नहीं है, बुलाया है'। पत्नी व्यस्त हैं, मैं जाता हूँ । उनका घर मेरे घर से कोई २०० मीटर दूर था, दूसरे ब्लाक में | पहुँचता हूँ, दरवाज़े के सामने ही कमरे में एक दुर्बलकाय पहाडी महिला जो विधवा सी लग रही थी, संदूकची पर सिमटी बैठी है - कोई साठ साल की, | कुछ आविष्ट-सी काँप रही है और कह रही है, 'मिकें येल भूत समज राखो। पैं मि त राज छों राज ..., भोलानाथ छूँ ..राजा भोलानाथ .' (मुझे इसने भूत समझा हुआ है, मैं तो राजा हूँ, राजा भोलानाथ)। मैं उसकी ओर ध्यान नहीं देता, भीतर बढ़ता हूँ। वहाँ घर की मालकिन भी काँपती हुई कह रही है, 'येकें घर बै निकालो..' (इसे घर से निकालो)। मैं लौट कर महिला के पास आकर मामला समझने की कोशिश करता हूँ | वह बिना मेरे कुछ पूछे ही कहती है, 'मकें येक आदिमल बुलै राखौ|' (मुझे इसके पति ने बुलाया है) और मेरे हाथ में एक पत्र थमा देती है। पत्र मेरे मित्र का ही लिखा हुआ है जिसमें मिन्नत की गई है कि 'एक बार दिल्ली आकर मेरी पत्नी को देख दो, मैं तुम्हें तीर्थ यात्रा करा दूँगा.' आदि। मैं फिर भीतर जाकर घर की मालकिन से ही कहता हूँ कि १-२ दिन में वो आजाएँगे। आखिर इन्हें बुलाया गया है तो ये कहाँ जाएँगी? गाँव से पहली बार दिल्ली आई हैं। वे मानती तो नहीं हैं पर यथासंभव समझा-बुझा कर लौट पड़ता हूँ और अपने कर्तव्य की इति समझ लेता हूंँ।
उसी रात दस-ग्यारह बजे । परिवार में सब खा-पीकर सो गए हैं। मैं लेटा कुछ पढ़ रहा हूँ | दरवाज़े की घंटी बजती है। देखता हूँ वही दो बच्चे। 'अंकल, माँ ने बुलाया है'! मुझे कुछ अजीब-सा लगता है। उन्हें दरवाज़े के बाहर ही छोड़कर वापिस बेड-रूम में आता हूँ | एक शौल ओढ़ता हुआ पत्नी को जगाकर कहता हूँ, दरवाज़ा बंद कर लें। वे असमंजस में पूछती हैं , जा कहाँ रहे हो। मज़ाक़िया लहजे में कहता हूँ, "अरे, दो औरतों के झगड़े में फ़ैसला करने जा रहा हूँ !"
दो मिनट की यात्रा। मित्र के घर। दरवाज़ा खुलते ही वही सुबह वाला सीन | महिला उसी संदूकची पर बैठी है। मैं उस कमरे की ओर झाँकता हूँ तो मुझे देखते ही जैसे ललकार कर चुनौती वाले स्वर में कहती है, "ऐ गोछै? अल्लै आपणि ज्वे थें कुनौछिए द्वी श्येंणिनक झकड़ में फैसाल करण हूँ जाणयूँ, आब ....च्यल छै तो कर फैसाल...." (आ गए? अभी अपनी पत्नी से कह रहे थे दो औरतों के बीच फैसला करने जा रहा हूँ, सच्चे ...के बेटे हो तो करो फैसला।)
मैं हैरान कि दो मिनट पहले जो बात मैंने अपने शयनकक्ष में नितांत वैयक्तिक क्षणों में अपनी पत्नी से कही, वो इतनी दूर इस महिला को कैसे मालूम...! मेरी बुद्धि चकरा गई। इस बात को तर्क से कोई कैसे समझे |
दोनों महिलाओं को यथासंभव समझाने के बाद समस्या का तात्कालिक हल मैंने यही निकाला कि आगंतुक महिला को अपने साथ लिवा लाया और वह रात उस महिला ने मेरी माँ की साथ बिताई। मेरे घर पहुँचते ही उनका व्यवहार बिल्कुल सामान्य था। पत्नी ने चाय पिलाई, रोटी-पानी की व्यवस्था की और वह महिला मेरी माँ के साथ बतियाती हुई कब सोईं, मुझे नहीं पता। अगले दिन चाय नाश्ते के बाद मैंने उन्हें उनके किसी रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया जिसका पता उनके पास था।
आठ-दस दिन बीत गए और बात आई-गई हो गई।
कहानी का उपसंहार अभी बाकी है।
लगभग दो सप्ताह के बाद एक दिन वे ही दो बच्चे पहुँचे तो मैं चौंक पड़ा। अबकी बार उनके पिताजी यानी हमारे मित्र ने बुलाया था चाय पर। उन दिनों टेलीफोन वगैरह होते नहीं थे, संदेशों का आदान-प्रदान ऐसे ही होता था। हम पहुँचे तो प्रविष्ट होते ही देखा रसोई में वह महिला और हमारे मित्र की पत्नी हँसती-खिलखिलाती काम में लगी थीं जैसे दो सगी स्नेहिल बहनें हों। मेरा चौंकना स्वाभाविक था। पूछा, जब तुम्हारे बीच ऐसी दाँत काटी रोटी का रिश्ता है तो उस दिन नाटक करने की क्या ज़रूरत थी।
उत्तर हमारे मित्र ने दिया बड़े विस्तार से। संक्षेप में तात्पर्य यह था कि उनकी पत्नी को कुछ अजीब-सा रोग हो गया था जिसके लिए मान्यता के अनुसार यही उपाय हो सकता था। यह महिला उस क्षेत्र में ऐसे उपायों की विशेषज्ञ मानी जाती हैं, उनकी रिश्तेदार भी हैं। इसलिए उन्होंने आदर पूर्वक इन्हें बुलाया था। पता नहीं था कि बेंगलुरु जाने के दिनों में यह आएँगी। लौटने के बाद सब मालूम हुआ तो उन्हें उनके रिश्तेदार के घर से दोबारा बुलाया गया। पत्नी की सफल चिकित्सा हुई और उन दोनों के साथ कुरुक्षेत्र की तीर्थ यात्रा कर लौटे हैं।
तब से जब भी कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ती है तो अनायास मन में विचार आता है, क्या सचमुच तर्क से परे भी है कुछ पहाड़ी जीवन में जिसे अनुभव तो किया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता ?