Thursday, 12 December 2024

हिंदी का सबसे बड़ा शब्द


यह कहना कठिन है कि हिंदी में सबसे बड़ा शब्द क्या है। संभवतः इस प्रकार का कोई प्रामाणिक कार्य हुआ भी नहीं है। हिंदी का उपहास करने वाले लोग दो शब्दों को उद्धृत करते हैं जो कभी प्रयोग में नहीं रहे!
~ लौहपथगामिनीवश्रामस्थल .... (रेलवेेेे स्टेशन) 

~ लम्बदंडगोलपिंडधरपकडप्रतियोगिता ..(क्रिकेट मैच)

हिंदी में भी अन्य भाषाओं की भाँति उपसर्ग और प्रत्ययों से नए शब्द निर्मित किए जा सकते हैं। संस्कृत में उपसर्ग प्रत्यय के अतिरिक्त संधि और समास से भी पदों को बहुत लंबा किया जा सकता है किंतु हिंदी क्योंकि भी योगात्मक भाषा है और खुलापन पसंद करती है इसलिए द्वंद समास के अतिरिक्त प्रायः समस्त पदों को अलग शब्द माना जाता है।

 
निम्नलिखित कुछ शब्द हिंदी साहित्य में प्रयुक्त हैं और उनकी गणना बड़े शब्दों में हो सकती है
जलकमलपत्रवत्  (8अक्षर)
परदुखकातरता (8)
कोटिब्रह्माण्डनायक (8)
स्थालीपुलाकन्याय (7)
किंकर्तव्यविमूढ़ताग्रस्त (10)
महाअभिनिष्क्रमण (8)
रूपोद्यानप्रफुल्लप्रायकलिका (12)
लावण्यलीलामयी (7)
प्रागैतिहासिकता (7)

)फोटो सौजन्य: विकी कॉमन्स)
इनमें 12 अक्षरों वाले "रूपोद्यानप्रफुल्लप्रायकलिका" को सबसे बड़ा शब्द माना जा सकता है। इसका प्रयोग अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के द्वारा 'प्रियप्रवास' में किया गया है। लेकिन यह भी सच है की हरिऔध के अतिरिक्त और किसी ने इस शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया। राधा जी की सुंदरता का वर्णन करते हुए कवि ने निम्नलिखित छंद में इसका प्रयोग किया है
रूपोद्यानप्रफुल्लप्रायकलिका राकेन्दुबिम्बानना।
तन्वंगी कल-हासिनी सुरसिका क्रीड़ाकलापुत्तली॥
शोभा वारिधि की अमूल्य मणि-सी लावण्यलीलामयी।
श्रीराधा मृदुभाषिणी मृगदृगी माधुर्य की मुर्ति थीं॥

•••••

Saturday, 7 December 2024

ठेंगे से 👍

👍 ठेंगा, कुतका और घुत्ता 👍
••••••
हिंदी में व्यापक रूप से प्रचलित ठेंगा शब्द "अंगुष्ठ" से है। अंगुष्ठ से अँगूठा > गूँठा > ठेंगा (वर्ण विपर्यय से)।


ठेंगा से कुछ मुहावरे हैं
ठेंगे पर रखना (कोई परवाह न करना) बड़े चौधरी बने फिरते हो, हम तुम्हें ठेंगे पर रखते हैं।
ठेंगा दिखाना (मना कर देना, धृष्टता पूर्वक अस्वीकार करना) बड़े भरोसे से सहायता माँगी थी किंतु उन्होंने ठेंगा दिखा दिया।
ठेंगे से (बला से) - उसकी कमाई मेरे ठेंगे से। मैं चिंता नहीं करता।
ठेंगा बजना (मारपीट होना)। जैसे यह कहावत:
जिसका काम उसी को साजे ।
और करें तो ठेंगा बाजे ।
ब्रज और बुंदेलखंडी में ठेंगे के लिए 'कुतका' शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। "ये ले ठेंगा मेरा'' के लिए "कुतका लै लै मेओ" कहा जाता है। कुमाउँनी में यह कुतका > घुत्ता हो गया है।
~ म्यर घुत्त ली ले - (मेरा ठेंगा ले ले)।
~ म्यार् घुत्त में  - (मेरे ठेंगे पर) !
ठेंगा के लिए पश्चिमी हिंदी क्षेत्र में कहीं ठोसा शब्द भी है। 

ठेंगा के लिए पश्चिमी हिंदी क्षेत्र में कहीं ठूँसा/ठोसा शब्द भी है। कुतका, ठोसा देशज प्रतीत होते हैं।

******


Friday, 25 October 2024

मुरजबंध शब्द (Palindrome Words)

मुरजबंध (palindrome) 
•••••
बचपन में जब मुरजबंध या पलिंड्रोम जैसे पारिभाषिक शब्दों की जानकारी नहीं थी तो स्कूल से आते-जाते ऐसे शब्दों के खेल खेला करते थे जो उल्टे-सीधे एक समान हों। तब डालडा नया-नया बाज़ार में आया था और बहुत लोकप्रिय उदाहरण था। कभी-कभी तो खेल को थोड़ा कठिन बनाने के लिए पहले घोषणा कर दी जाती थी डालडा कोई नहीं बताएगा।
(चित्र सौजन्य: नभाटा)

वाक्यों में अन्य कुछ थे - 
~सेबक राम मरा कब से। 
~तेजू के बाबा के जूते।
~राधा की बूनी में नीबू की धारा।
~राम लाल का लला मरा।

बहुत बाद में बड़ी कक्षाओं में मालूम हुआ मुरजबंध (palindrome) शब्द वे हैं जो उल्टे-सीधे एक समान बोले-लिखे जा सकते हैं। जैसे: नयन, नवीन, जलज, तप्त, चम्मच, नग्न, डालडा, सरस, जहाज, नमन, नवजीवन, मलयालम, वनमानव, नवभुवन, नववन, कनक, कारिका, बल्ब, रबर इत्यादि। मलयालम MALAYALAM तो हिंदी, अंग्रेजी दोनों का उदाहरण है।

चलिए, फ़्लैशबैक मोड में इस सूची को अपनी जानकारी से खेल-खेल में आगे बढ़ाइए।

Sunday, 20 October 2024

करवा चौथ के बहाने

करवा चौथ के बहाने
•••••••


किसी ने कल पूछा था कुमाऊँ पहाड़ में सुहाग  के लिए मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्व बनाम करवा चौथ पर। तो भद्रमुखो और सुमुखियो, इस थीम का पुराना ठेठ पहाड़ी लोक पर्व तो सातूँ-आठूँ (गौरा, गमरा) पर्व था जो कुमाऊँ के अलावा पड़ोसी नेपाल में भी मनाया जाता रहा है। इस पर्व की खासियत यह भी है की इसमें पंडिताई-पुरोहिताई, दान-दक्षिणा का कोई स्कोप नहीं था। शुद्ध लोक पर्व! गाँव की चार महिलाएँ खेत में जाकर घास से गौरा महेश बनाकर डलिया में रखकर लातीं , निर्धारित घर में उन्हें स्थापित कर दिया जाता और मिलकर उनकी पूजा करतीं , बड़ी-बूढ़ी आमाएँ बिणभाट या गँवरा की लोक कथा सुनातीं, बाकी  "हो बलऽ हो बलऽ" कहकर हुंकारा भरतीं। उसी आँगन में पूजा के बाद और शाम को भी फुर्सत होने पर 'खेल' लगाए जाते, लोकगीत, लोक नृत्य होते। दो-चार दिन उत्सव मना कर उन डलियों को फिर से सिर में रहकर घास-फूस की मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता। गणेश पूजा या दुर्गा पूजा की भाँति न अपद्रव्य फैलने की चिंता, न पर्यावरण प्रदूषण की। प्रकृति से जुटाए पाँच तत्व प्रकृति में ही मिल जाते।

 
बामण पहाड़ में आने लगे तो उनके साथ उनके रिवाज़ आए। स्वाभाविक है कि रीति रिवाजों काअंतर्मिश्रण भी प्रारंभ हुआ। वे स्थानीय रिवाज़ सातूँ-आठूँ को मानने लगे और पौराणिक पात्र सत्यवान सावित्री को लेकर मनाया जाने वाला उनका एक और पर्व भी साथ में आ गया, बट सावित्री अमूस। ज़रूरी नहीं था कि बट की ही पूजा की जाए, क्योंकि बट पहाड़ में सब जगह नहीं होता। उसके लिए विकल्प खोजे गए कि बड़ का पेड़ न हो तो बड़ की टहनी, नहीं तो आँवले का पेड़ और उसके अभाव में भी आँवले की टहनी की पूजा की जाए। कुछ न मिले तो घर के मंदिर (द्यापतनक् ठ्या) में ही कागज पर सत्यवान सावित्री उकेरकर पूजा कर ली जाए। कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं। हाँ, पंडिताई और दान-दक्षिणा ज़रूर जुड़ गए। यह बाध्यता भी नहीं थी कि प्रत्येक सुहागन सावित्री का व्रत करेगी। यह परंपरा जरूर थी कि एक बार अगर व्रत उठा लिया तो फिर छोड़ा नहीं जाना चाहिए। देखा-देखी ब्राह्मणेतर वर्ग में भी स्वेच्छा से बट सावित्री व्रत चला। आज भी सारे पहाड़ में बट सावित्री नहीं मनाई जाती।

 
समय बदला। पहाड़ी समाज की देसी (मैदानी ) समाज में और देसी समाज की पहाड़ी समाज में आवत-जावत बढ़ी। आज़ादी के बाद पहाड़ में पंजाबी व्यापारी आ बसे और तराई भाग में पंजाबी किसानों को जमीनें आवंटित हो गईं। तो उनके रीति-रिवाजों से लोग परिचित होने लगे। यह कुछ घरों में, खासकर पंजाबियों के पड़ोसी परिवारों में करवा चौथ के परिचय का दौर था। कुछ नई बहुओं को यह नया पर्व अच्छा लगा। फिर पति के लिए शुभकामना तो कोई भी सुहागन चाहेगी, इसलिए भी इसकी ओर लोग आकर्षित हुए। और करवा चौथ चल पड़ा। यह बात और है कि पहाड़ में तो लोग करवा शब्द को जानते तक नहीं थे क्योंकि पहाड़ में मिट्टी के बर्तन बनाए नहीं जाते। तड़के सरगी खा लेने और दिन भर पानी तक न पीने का चलन इस्लामी रमजान के रोज़े के विधि विधान से प्रभावित था। तो कोई बात नहीं, बाकी लोग तो कर ही रहे थे। हमें तो उनका अनुकरण करना था।


इसके बाद आया एकता कपूर सीरियलों का दौर जिनमें करवा चौथ को ग्लैमराइज कर दिया गया। इस पर बाजारवाद का तड़का लगा और यह पहाड़ी शहरों और कस्बों का भी चहेता पर्व हो गया। इस पर्व को भला-बुरा (भला कम, बुरा ज्यादा) कहने वाले लोग भी मिले लेकिन इससे उत्साह में कमी नहीं आई! आ भी नहीं सकती क्योंकि इस पर्व से नारी की सजने-सँवरने और अपने को आकर्षक दिखाने की सहज मूल प्रवृत्ति भी जुड़ी हुई है। अब यह पंजाब हरियाणा का पर्व नहीं रहा, अखिल भारतीय हो रहा है और धीरे-धीरे वैश्विक भी, क्योंकि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इसे धूम-धाम से मनाते हैं।

 
समय आगे बढ़ता है। समय के साथ-साथ कुछ पुरानी चीजें छूटती हैं, कुछ नई जुड़ती हैं । अब यदि यह करवा चौथ जुड़ गया है तो नाक-भौंह सिकोड़ने की क्या ज़रूरत है। पर्व ही तो है, खुश रहने का एक बहाना । मनाइए और खुश रहिए।

Tuesday, 1 October 2024

गांधी जी को याद करते हुए एक स्याही की याद

सन 1930 -'34 के बीच जब स्वदेशी आंदोलन शिखर पर था तो एक बार महात्मा गांधी के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हुई कि विदेशी चीजों का बहिष्कार करने की बात हम विदेशी स्याही में लिखकर कर रहे हैं। यह तो एक विडंबना है। इसका कोई हल निकल जाना चाहिए। उन्होंने बंगाल के एक क्रांतिकारी सतीश चंद्र दासगुप्त से बात की जिनका संबंध बंगाल केमिकल से था। सतीश चंद्र स्वयं भी स्याही बनाना जानते थे।
बढ़ते-फैलते स्वतंत्रता आंदोलन के कारण अंग्रेजी सरकार को कांग्रेस के नाम पर धोती-कुर्ते से भी चिढ़ हो गई थी। दबाव बनाने के लिए राजशाही विश्वविद्यालय (अब बांग्लादेश) में एक प्रोफेसर नानिगोपाल को प्रशासन के द्वारा धोती-कुर्ता पहनकर विवि आने से मना कर दिया गया तो वे कोलकाता में घर-घर जाकर स्याही बेचने लगे और यह "प्रो.मैत्रेय की स्याही" नाम से प्रसिद्ध हो गई।
 सतीश बाबू ने अपना स्याही बनाने का फार्मूला प्रोफेसर नानी गोपाल को बता दिया। यही प्रोफेसर नानिगोपाल मैत्र और उनके भाई शंकराचार्य मैत्र सुलेखा कंपनी के संस्थापक बने। स्वतंत्रता संघर्ष के युग में गांधीजी से आशीर्वाद प्राप्त कर स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में आई थी सुलेखा। कहते हैं स्वयं महात्मा गांधी ने इस स्याही का नामकरण किया था।
1947 में भारत के स्वतंत्र होने तक अपनी स्थापना के लगभग 12 साल में ही सुलेखा नाम बंगाल में तो घर-घर में प्रसिद्ध हो गया था। अन्यत्र भी इसकी भारी माँग थी।
आज ई-नोट्स, ईमेल, लैपटॉप, एंड्रॉयड के युग में जब कलम-स्याही से लिखना इतिहास हो चुका, लोग पत्र लिखना तक भूल गए, सुलेखा की वापसी चौंकाने वाली है; किंतु कम से कम पिछली दो पीढ़ियाँ सुलेखा को बेहद प्यार करती रही हैं। कभी विद्यार्थियों, लेखकों और अन्य मसिजीवियों की मेज़ की शोभा हुआ करती थी सुलेखा।
आगे Chelpark और Camel भी बहुत प्रसिद्ध हुईं , फिर भी सुलेखा को कुछ लोग प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते थे। कुछ लोगों के लिए सुलेखा "बंग-स्वाभिमानेर प्रतीक" भी थी।
*****

Monday, 27 May 2024

भक्त, अंधभक्त और चमचा-चमची

भक्त √भज् (भजन करना) से बना है। भक्त भगवान के होते हैं जो ईश्वर में समर्पण का भाव रखते हैं। अपने आराध्य देवी-देवता को स्नान , शृंगार , पूजा, भोग लगाने के बाद ही स्वयं भोजन करते हैं तथा आरती, आराधना, पाठ, स्तोत्र-भजनों के द्वारा आराध्य का गुणगान करते हैं किंतु अपना दैनंदिन काम भी विवेक के अनुसार करते रहते हैं। भक्त भात को भी कहा जाता है। भात अर्थात पका हुआ चावल जो पुनः धान या चावल नहीं बन सकता।

अंधभक्त अपने आराध्य में कोई बुराई देख ही नहीं सकता। उसके गलत काम के लिए भी उसे समर्थन देता है और उसके लिए गाली-गलौच ही नहीं, लड़ने-भिड़ने को तत्पर रहता है। दरअसल उसे लगता ही नहीं कि उसका आराध्य कोई गलत काम कर सकता है। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आराध्य के किसी काम से लोक का या उसका अपना अहित हो रहा हो। वह आँख बंद करके कहता है कि "उन्होंने" किया है तो ठीक ही किया होगा।

 वडनेरकर जी ने बताया चमचा संस्कृत चमस् से है। लाक्षणिक अर्थ में कोई चमचा केवल तभी तक किसी व्यक्ति की तारीफ़ करता है और उसके पीछे लगा रहता है, जब तक कि उसे उससे कुछ फ़ायदा होता है या काम सिद्ध होने की उम्मीद रहती है। जहाँ उसका स्वार्थ सिद्ध नहीं होता या सिद्ध होने की संभावना नहीं रहती, वहीं पर चमचा आश्रय या सुविधा देने वाले का साथ छोड़ देता है..।

व्याकरण की दृष्टि से चमचा पुल्लिंग है और चम्मच भी। कुमाउँनी में चम्मच स्त्रीलिंग है। हिंदी में लिंग निर्धारण करते हुए कभी-कभी आकार और उपयोग में जो बड़ा होता है और अधिक काम करने में समर्थ होता है उसे पुल्लिंग माना जाता है। इस आधार पर कुमाउँनी में चम्मच आकार और उपयोगिता में छोटी या कमतर होने से स्त्रीलिंग है। लाक्षणिक अर्थ में जब प्रयोग किया जाता है तो लिंग निर्धारण का सिद्धांत भिन्न हो जाता है। चमचागिरी करने वाला पुरुष तो चमचा ही कहा जाएगा, किंतु चमचागीरी करने वाली महिला चम्मची नहीं, चमची कहलाएगी। दूसरे शब्दों में घटक द्रव्य के अनुसार चमचा या चम्मच धातु या काठ आदि से निर्मित होते हैं और चमची हाड़-मास से। मुँह लगना या मुँहलगा होना दोनों की विशेषता है।
© 

Tuesday, 21 May 2024

चायमहिमा

॥चायदिवसे चायमहिमा॥
☕☕
(पन्तोपाह्व सुरेश:)
न त्वहं कामये लक्ष्मीं प्रोन्नतिं वा महत्पदम्।
त्रिसन्ध्यं चषके चायं काॅफीम्वा यच्छ हे प्रभो !
धनं मास्तु यशो मास्तु तत्किञ्चिन्नैव रोचते।
चायं देह्यथवा कॉफीम्त्रिवारं तु दिने दिने॥
रोगशोकादिशमनं श्रमखेदहरं तथा। 
चायपानं सदा कुर्यात् त्रिसंध्यं श्रद्धयान्वितः।
सत्ये अमृतपानं स्यात् त्रेतायां सोमपानकम्।
द्वापरे गोरसं श्रेष्ठं चाय-कॉफी कलौयुगे ॥
चायपानसमं किञ्चित्पानं नास्ति महीतले।
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खं नैवोपजायते।
कात्यायनो महर्षिश्च एवमूचे हि वार्त्तिके
 पठितं भविता सर्वै: 'समाहारे चायमिष्यते'।।
(Photo courtesy: Wikicommons)

Sunday, 11 February 2024

तर्क से परे भी है कुछ पहाड़ों में

तर्क से परे भी है कुछ पहाड़ों में ... ...
♦️

[आज एक पत्रिका में लद्दाख में रहने वाली एक बौद्ध महिला के बारे में पढ़ रहा था जो प्रश्न कर्ता के मन में उठे सवालों का उत्तर ठीक-ठीक दे देती है। लेखिका का कहना था कि ऐसा दावा करने वाले दैवी शक्ति वाले (oracle) अनेक लोग हिमालय क्षेत्र के विभिन्न स्थानों में मिल जाएँगे। इसे पढ़कर मुझे अपने साथ घटी एक घटना याद आ गई। 

मैं नास्तिक नहीं पर भूत-प्रेत, जागर-पूछ, झाड़-फूँक जैसी बातों पर मुझे कभी कोई विश्वास नहीं दिला पाया। इस घटना का कोई तर्कसंगत/वैज्ञानिक कारण शायद रहा होगा जिसे मैं आज तक नही समझ पाया हूँ। जो हो, यह संस्मरण एकदम सच्चा है। कारण विश्लेषण का काम मैं पाठकों पर छोड़ रहा हूँ।]
____

बात कोई ४५ साल पुरानी है | पड़ौस में एक पर्वतीय मित्र रह रहे थे जो राज्यसभा सचिवालय में किसी उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे। उन्हें संसदीय समिति की बैठक में बेंगलुरु जाना था | उनकी पत्नी कुछ अस्वस्थ थीं, सो जाने से पहले उनकी ओर से एक औपचारिक-सा अनुरोध हमसे किया गया कि 'कभी बच्चों के हाल-चाल पूछ लेना', और वैसा ही औपचारिक-सा हमारा उत्तर कि 'फिक्र न करें...’

दो-तीन दिन बाद सवेरे उनके दो छोटे बच्चे आते हैं, 'अंकल, माँ की तबीयत ठीक नहीं है, बुलाया है'। पत्नी व्यस्त हैं, मैं जाता हूँ । उनका घर मेरे घर से कोई २०० मीटर दूर था, दूसरे ब्लाक में | पहुँचता हूँ, दरवाज़े के सामने ही कमरे में एक दुर्बलकाय पहाडी महिला जो विधवा सी लग रही थी, संदूकची पर सिमटी बैठी है - कोई साठ साल की, | कुछ आविष्ट-सी काँप रही है और कह रही है, 'मिकें येल भूत समज राखो। पैं मि त राज छों राज ..., भोलानाथ छूँ ..राजा भोलानाथ .' (मुझे इसने भूत समझा हुआ है, मैं तो राजा हूँ, राजा भोलानाथ)। मैं उसकी ओर ध्यान नहीं देता, भीतर बढ़ता हूँ। वहाँ घर की मालकिन भी काँपती हुई कह रही है, 'येकें घर बै निकालो..' (इसे घर से निकालो)। मैं लौट कर महिला के पास आकर मामला समझने की कोशिश करता हूँ | वह बिना मेरे कुछ पूछे ही कहती है, 'मकें येक आदिमल बुलै राखौ|' (मुझे इसके पति ने बुलाया है) और मेरे हाथ में एक पत्र थमा देती है। पत्र मेरे मित्र का ही लिखा हुआ है जिसमें मिन्नत की गई है कि 'एक बार दिल्ली आकर मेरी पत्नी को देख दो, मैं तुम्हें तीर्थ यात्रा करा दूँगा.' आदि। मैं फिर भीतर जाकर घर की मालकिन से ही कहता हूँ कि १-२ दिन में वो आजाएँगे। आखिर इन्हें बुलाया गया है तो ये कहाँ जाएँगी?‌ गाँव से पहली बार दिल्ली आई हैं। वे मानती तो नहीं हैं पर यथासंभव समझा-बुझा कर लौट पड़ता हूँ और अपने कर्तव्य की इति समझ लेता हूंँ।

उसी रात दस-ग्यारह बजे । परिवार में सब खा-पीकर सो गए हैं। मैं लेटा कुछ पढ़ रहा हूँ | दरवाज़े की घंटी बजती है। देखता हूँ वही दो बच्चे। 'अंकल, माँ ने बुलाया है'! मुझे कुछ अजीब-सा लगता है। उन्हें दरवाज़े के बाहर ही छोड़कर वापिस बेड-रूम में आता हूँ | एक शौल ओढ़ता हुआ पत्नी को जगाकर कहता हूँ, दरवाज़ा बंद कर लें। वे असमंजस में पूछती हैं , जा कहाँ रहे हो। मज़ाक़िया लहजे में कहता हूँ, "अरे, दो औरतों के झगड़े में फ़ैसला करने जा रहा हूँ !"

दो मिनट की यात्रा। मित्र के घर। दरवाज़ा खुलते ही वही सुबह वाला सीन | महिला उसी संदूकची पर बैठी है। मैं उस कमरे की ओर झाँकता हूँ तो मुझे देखते ही जैसे ललकार कर चुनौती वाले स्वर में कहती है, "ऐ गोछै? अल्लै आपणि ज्वे थें कुनौछिए द्वी श्येंणिनक झकड़ में फैसाल करण हूँ जाणयूँ, आब ....च्यल छै तो कर फैसाल...." (आ गए? अभी अपनी पत्नी से कह रहे थे दो औरतों के बीच फैसला करने जा रहा हूँ, सच्चे ...के बेटे हो तो करो फैसला।)

मैं हैरान कि दो मिनट पहले जो बात मैंने अपने शयनकक्ष में नितांत वैयक्तिक क्षणों में अपनी पत्नी से कही, वो इतनी दूर इस महिला को कैसे मालूम...! मेरी बुद्धि चकरा गई। इस बात को तर्क से कोई कैसे समझे |

दोनों महिलाओं को यथासंभव समझाने के बाद समस्या का तात्कालिक हल मैंने यही निकाला कि आगंतुक महिला को अपने साथ लिवा लाया और वह रात उस महिला ने मेरी माँ की साथ बिताई। मेरे घर पहुँचते ही उनका व्यवहार बिल्कुल सामान्य था। पत्नी ने चाय पिलाई, रोटी-पानी की व्यवस्था की और वह महिला मेरी माँ के साथ बतियाती हुई कब सोईं, मुझे नहीं पता। अगले दिन चाय नाश्ते के बाद मैंने उन्हें उनके किसी रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया जिसका पता उनके पास था।

आठ-दस दिन बीत गए और बात आई-गई हो गई। 
कहानी का उपसंहार अभी बाकी है। 

लगभग दो सप्ताह के बाद एक दिन वे ही दो बच्चे पहुँचे तो मैं चौंक पड़ा। अबकी बार उनके पिताजी यानी हमारे मित्र ने बुलाया था चाय पर। उन दिनों टेलीफोन वगैरह होते नहीं थे, संदेशों का आदान-प्रदान ऐसे ही होता था। हम पहुँचे तो प्रविष्ट होते ही देखा रसोई में वह महिला और हमारे मित्र की पत्नी हँसती-खिलखिलाती काम में लगी थीं जैसे दो सगी स्नेहिल बहनें हों। मेरा चौंकना स्वाभाविक था। पूछा, जब तुम्हारे बीच ऐसी दाँत काटी रोटी का रिश्ता है तो उस दिन नाटक करने की क्या ज़रूरत थी। 

उत्तर हमारे मित्र ने दिया बड़े विस्तार से। संक्षेप में तात्पर्य यह था कि उनकी पत्नी को कुछ अजीब-सा रोग हो गया था जिसके लिए मान्यता के अनुसार यही उपाय हो सकता था। यह महिला उस क्षेत्र में ऐसे उपायों की विशेषज्ञ मानी जाती हैं, उनकी रिश्तेदार भी हैं। इसलिए उन्होंने आदर पूर्वक इन्हें बुलाया था। पता नहीं था कि बेंगलुरु जाने के दिनों में यह आएँगी। लौटने के बाद सब मालूम हुआ तो उन्हें उनके रिश्तेदार के घर से दोबारा बुलाया गया। पत्नी की सफल चिकित्सा हुई और उन दोनों के साथ कुरुक्षेत्र की तीर्थ यात्रा कर लौटे हैं।

तब से जब भी कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ती है तो अनायास मन में विचार आता है, क्या सचमुच तर्क से परे भी है कुछ पहाड़ी जीवन में जिसे अनुभव तो किया जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता ?

Friday, 9 February 2024

आदिम गंध

आदिम गंध
♦️
महवे-सी मस्त
मदमाती-महकती-थरथराती धरती
ओढ़ लेगी किसी फागुनी शाम को
टेसुई ओढ़नी 
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध
तन-मन पर ,
आँज लेगी
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे
उतरती साँझ का काजल और
चल देगी छनकती-छमकती
कल-कल छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ... ...
          #
थम जाएगी पुरवा
रातभर ...
मचलेगा शिराओं में तूफ़ान
पिघलकर सियरा जाएगा लावा ...
भोर की बेला
लजा जाएँगे
पूरब के ललछोंहे गाल
और गुलाबी हो जाएँगे
दौड़ पड़ेगा बादल का एक टुकड़ा
सूरज की ऑंखें मीचने कि
बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से
पसीना-पसीना हो जाएगी 
लुटी-थकी हवा
भाग जाएगी
आदिम गंध को समेटे अपने आगोश में |
©
फरवरी, २०१३