रंग आधारित भेदभाव क्या मानव स्वभाव में है?
'बुरी नज़र वाले का मुँह काला' ही क्यों?
'अपराधियों की काली सूची' क्या काले कागज़ पर छपती है?
काले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं। क्या दिलवाले काले दुर्लभ होते हैं?
हमारे अनेक देवी-देवता काले रंग के हैं। भारतीय भी गोरे नहीं, साँवले या ताँबई रंग के माने जाते हैं। फिर भी काले के प्रति हमारी ऐसी भावना क्यों?
भारत में रंगभेद का अपना अलग ही स्वरूप है। लिंगभेद से जुड़कर यह और भयानक हो जाता है। विदेशी रंगभेद से भारतीय रंगभेद इस अर्थ में भी में अलग है कि विदेशों में काले रंग का भेदभाव स्त्री और पुरुष दोनों के साथ समान रूप से होता है परंतु भारत में काले या साँवलेपन को खासतौर से स्त्रियों के सदंर्भ में देखा जाता है। भारतीय समाज में लड़कियों के लिये साँवला रंग किसी शारीरिक अपंगता जैसा ही बड़ा अभिशाप है।
केरल की मुख्य सचिव शारदा मुरलीधर की भांति यह कहने का साहस बहुत कम महिलाएँ जुटा पाती हैं, " हाँ, मैं काली हूँ। काला रंग गोरे से सात गुना सुंदर है।
इस कुमाउँनी लोकगीत में, जिसकी भाषा भोजपुरी लगती है, रंगभेद को बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बारात आई तो लड़की ने कहीं से छिपकर दूल्हे को देख लिया। साँवले दूल्हे को देखकर लड़की उदास है। पिता से शिकायत करती है तो उसे समझाया जाता है कि दूल्हा वास्तव में साँवला नहीं है। माघ के पाले में और जेठ की धूप में चलकर आया, इसलिए मौसम की मार से साँवला लगता है। और बेटी, मथुरा में श्रीकृष्ण और गया में गदाधर (विष्णु) भी तो साँवले थे। इसलिए पछतावा क्यों—
"बाबुल, हम गोरी बर साँवरो।
बेटी, बर आयो माघ तुषारी में
बेटी, बर आयो जेठ का घाम में
बेटी, या गुन बर तेरो साँवरो ।
बेटी, मत करो मन में पछतावनो
बेटी, मथुरा में श्रीकृष्ण साँवरो।
बेटी, गया में गदाधर साँवरो।"