अच्छी सेहत का राज़ : पेट का मरीज होना
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१९७६ में आपातकाल घोषित होने से कुछ पहले की बात है | दिल्ली सरकार की “साहित्यकला परिषद” ने मुझे नवोदित नाटककार के रूप में सम्मानित किया था और मेरे मित्र बलवंत मनराल को कहानीकार के रूप में | हमारे लिए विशेष गर्व की बात यह थी कि सुप्रसिद्ध लेखक और वरिष्ठ नाटककार विष्णु प्रभाकर को और पंजाबी, हिंदी लोकतत्त्व के मर्मज्ञ देवेंद्र सत्यार्थी जी को भी हमारे साथ ही सम्मानित किया गया था |
पुराना सचिवालय में सरकारी समारोह के बाद के कुछ दिनों में दिल्ली की अनेक साहित्यकार संस्थाओं ने हम लोगों के लिए अभिनन्दन कार्यक्रम रखे थे | ऐसा ही एक आयोजन सरोजिनीनगर में उत्तराखंडी मित्रों के द्वारा रखा गया था जिसमें हम चारों उपस्थित थे |
देवेंद्र सत्यार्थी जी वयोवृद्ध थे। टैगोरनुमा सफ़ेद दाढ़ी से ढका हुआ अद्भुत तेजोमय सौम्य मुखमंडल। विष्णु जी तब कोई चौसठ-पैंसठ वर्ष के रहे होंगे, मुझसे लगभग तीस साल बड़े| इकहरा कद, भव्य मुखमंडल और चेहरा सुर्ख गुलाबी | मंच की औपचारिकताओं के बाद चाय पीते हुए मैंने विष्णु प्रभाकर जी से पूछा, “आपके अच्छे स्वास्थ्य का रहस्य क्या है ?”
सरल-सी मुस्कान के साथ उत्तर मिला, “देखो भाई, तीन कारण हैं : एक– मैं सुबह घर से निकलकर पूरे राजघाट की सैर करता हूँ, ५-६ किलोमीटर, दो– शाकाहारी हूँ और तीन– पेट का मरीज़ हूँ !”
आखिरी बात पर चकित होकर मैंने पूछने की हिम्मत की. “भाई साहब, तीसरी बात समझ में नहीं आई |”
वे उसी सादगी से बोले, “ यही तो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है | पेट का मरीज हूँ इसलिए खान-पान में परहेज रखता हूँ !” और फिर ठहाके।
आज सोचता हूँ, कितनी सटीक बात थी उनकी| अधिकांश बीमारियाँ खान-पान की बदपरहेज़ी से ही तो जनमती हैं |
Thursday, 6 March 2014
पेट का मरीज हूँ इसलिए स्वस्थ हूँ
Monday, 3 March 2014
"बोनस में जी रहा हूँ" : भवानीप्रसाद मिश्र
याद आता है भवानी
२० फरवरी, १९८५ को भवानी भाई स्मृतिशेष हुए थे | बहुत याद आते हैं आज भी..
सत्तर के दशक का उत्तरार्ध | संभवतः दो अक्तूबर, 1979 । "गांधी-सन्निधि" में भवानीप्रसाद मिश्र के आवास पर ही हम लोगों ने एक काव्यगोष्ठी रखी थी, भवानी भाई के सान्निध्य में | राजनीतिक स्टंटबाज़ी के लिए मशहूर दिल्ली में उस दिन के लिए एक दल विशेष ने घोषणा की थी कि अमुक-अमुक ने राजघाट को अपवित्र कर दिया है, वे लोग समाधि को गंगाजल से धोकर पवित्र करेंगे | राजघाट पर यही नाटक हुआ। प्रातःकाल किसी दल ने श्रद्धांजलि अर्पित की तो फिर दूसरे ने समाधि को गंगाजल से धोने का उपक्रम किया। संघर्ष हुआ, पुलिस ने लाठी चार्ज किया अश्रुगैस छोड़ी और बहुत लोग घायल हुए। गांधी समाधि पर छोटा युद्व और रक्तपात होने के समाचार हमें मिल चुके थे। अगले दिन एक अंग्रेजी अखबार के मुखपृष्ठ पर शीर्षक था: "लाठीचार्ज, टियरगैस एंड राजनारायन एट राजघाट"
तो ऐसी स्थितियों में कवि गोष्ठी के लिए एकत्र होना अटपटा लग रहा था | पर आज के जैसे संचार माध्यम न होने से आमंत्रित लोगों को रोक पाना संभव नहीं था| लोगों के पास टेलीफ़ोन तक नहीं होते थे | अपराह्न में चार बजे के आसपास हम बीसेक जन, तथाकथित कवि, दिल्ली की अनेक दिशाओं से सन्निधि पहुँचे |
कुछ ही देर बाद भवानी भाई कमरे में आ गए| गुस्से में लाल तमतमाता चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें डबडबाई हुई | कुछ समझ नहीं आया कि सदा निश्छ्ल हँसी की चाँदनी बिखेरता भव्य मुखमंडल आज ऐसी उग्र मुद्रा में क्यों है | कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ |
बैठते ही बिना किसी औपचारिकता के शुरू हो गए | कुछ इस तरह : ‘ये लोग राजघाट को शुद्ध-पवित्र करेंगे ...! अरे, जिसकी आत्मा पवित्र थी, जिसकी सोच पवित्र थी, जिसने साधनों की पवित्रता पर बल दिया, जो मानवता को पवित्र कर गया, उसकी समाधि को ... ?! जीते जी तो उस महात्मा को जीने नहीं दिया, सीना छलनी कर दिया, अब उसके मर जाने पर उसकी स्मृति से भी खिलवाड़ ... । सत्य-अहिंसा के लिए जीने वाले की समाधि पर लाठियाँ चलाई गई हैं ...!' वे बोलते ही चले गए।
स्पष्ट था कि उस दिन की घटनाओं ने उस समर्पित भावुक योद्धा को भीतर तक आहत कर दिया था| संवेदनशील कवि, चिन्तक, ऐसा गांधीवादी जिसकी हर साँस गांधीमय हो, उसकी वेदना का अनुमान लगाना भी कठिन था |
भवानी भाई बोलते ही चले गए ..एक-एक शब्द उनकी मर्म वेदना का गवाह था, भावनाओं से भरा | कभी कंठ रुँध जाता पर आवेग था कि रुकता ही न था, मानो कोई शांत पर्वत भीतर घुमड़ रहे लावे को रोक नहीं पा रहा हो| यह संवाद नहीं, एकालाप था जैसे वे अपने आप से बात कर रहे हों।
अब एक और चिंता हुई, उन्हें कुछ समय पहले ही दिल का दौरा पड़ चुका था | इतना आवेग, भावावेश चिंताजनक हो सकता था | अनुपम, उंनके सुपुत्र, विशेष रूप से चिंतित थे और उन्हें भीतर ले जाना चाहते थे। सो उनके स्वास्थ्य और हृदयाघात से हाल ही में उबरने की बात का हवाला देते हुए डरते-डरते निवेदन किया गया कि अब बस करें | उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है |
उत्तर में भवानी भाई ने जो कहा उसका एक-एक शब्द याद है | बोले, “ अरे भाई, दिल के इतने दौरे पड़ने के बाद मैं तो बोनस में जी रहा हूँ, इसलिए मेरी चिंता न करें और जो आज हुआ है वह क्या मौत से कम है? मुझे न रोकिए, मरने के भय से मैं कैसे चुप रह सकता हूँ ..”
वे तभी थमे जब आवेग कम हुआ | किसी तरह अनुपम उन्हें भीतर ले गए।
गोष्ठी की औपचारिकता हुई, क्योंकि भवानी जी का विशेष आग्रह था कि हम चाय पीकर ही जाएँ।
कहाँ होगा शिवचरण
कहाँ होगा शिवचरण ?
स्टेट बैंक का लुभावना पद छोड़ कर हम आए अध्यापन के व्यवसाय में, मन में कुछ जज़्बे, कुछ सपने लिए हुए। एक आग थी कि नया कुछ करेंगे। जीर्ण, जर्जर ढाँचे में घुस जाने के बाद सबकुछ आसान नहीं था। ऐसे में कुछ विद्यार्थियों के चहेते बने, तो कुछ से उलझना भी पड़ा।
एक दिन सुबह ही रिज़र्वेशन कराकर लौट रहे थे अजमेरी गेट की ओर से। एक हट्टा-कट्टा गब्बरसिंह छाप नौजवान, बढ़ी दाड़ी, बिखरे बाल, तहमद लपेटे... अचानक सामने से आकर पैर छुए और हमने यह मानकर कि कभी विद्यार्थी रहा होगा, सर हिलाकर स्वीकारा और आगे बढ़ने की जुगत देखने लगे क्योंकि पैर छूने वाले की काया ने बरामदा करीब-करीब पूरा ही घेर लिया था।
‘’आपने पहचाना नहीं सर’’ , अब भारी आवाज भी गूँजी तो हमने सहज ही कहा, ‘‘भई, पहचाना तो नहीं, उम्र के साथ आपलोग बड़े हो जाते हैं तो शक्ल काफी बदल जाती है।’’
तुरत उसने बताया, “सर, मैं वही हूँ जिसने आपको छुरा दिखाया था ..”
क्षणभर में याद आ गया और मैंने उसे गले लगाकर पूछा, “अरे शिव...,कैसे हो !”
बस, उसने वहीं दीवार के साथ सटकर अपनी राम कहानी शुरू की और पश्चात्ताप के आँसुओं से न केवल खुद भीगा, मुझे भी अंदर तक हिला गया। कहानी भी ऐसी कि कोई एक उपन्यास लिखे तो भी शायद ही पूरी हो।
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उसने चाय वाले को रोक लिया। मैं कुछ कहूँ इससे पहले ही मुझे एक अधटूटी दीवार पर बिठाकर आप नीचे बैठ गया।
“ कुछ और सुनाओ, तुम्हारे माता-पिता कैसे हैं?” मैंने चाय पकड़ते हुए पूछा।
“नहीं रहे सर, मैंने मार दिए दोनों ..”
“क्या कह रहे हो ? ठीक से बताओ।”
“आप घर आए थे तो बीमार माँ को तो आपने भी देखा था। बेटे को बड़ा आदमी बना नहीं सकी और बिगड़े बेटे को झेल नहीं सकी .. और पिताजी उसके मरने के बाद साल भर भी नहीं रहे, मैं उनके लिए भी कुछ नहीं कर पाया।"
"फिर तुम ?"
“मेरा क्या होना था, होश में आने तक बहुत देर हो गई थी सर।"
“और तुम्हारे दोस्त ...?” मुझे मालूम था बड़े संपन्न घरों के दोस्त थे उसके।
“नाम मत लीजिए उनका.. उनके लिए क्या-क्या पंगे नहीं लिए मैंने। आपसे भी उन्हीं के चक्कर में बदतमीज़ी की थी .. “
“इसीलिए पूछ रहा हूँ ..”
“और भी बड़े आदमी बन गए हैं वे, वो प्रभात एक बैंक में बड़ा मनेजर है। प्रेम की कई कंपनियां हैं, लेकिन मिलने गया तो बाहर से ही भगा दिया। मुसीबत में कोई नहीं होता सर..”
“और अशोक ?”
“अशोक ने बुलाया था, कुछ काम देने के लिए भी कहा , लेकिन मुझे लगा कि मेरी रेपुटेशन की वजह से कहीं उसके क्लाइंट ही न कम होने लगें, इसलिए ..”
“सागर और सतवीर तो तुम्हारे दाएँ-बाएँ हाथ थे ..” मैं अतीत की ओर लौट रहा था।
“सागर को एक वारदात में गोली लगी थी सर और सतवीर को किसी ने छुरा भोंक दिया था, एक महीना सफदरजंग हॉस्पिटल में रहा..”
मैंने शिव को नहीं बताया कि हॉस्पिटल में मैं सतवीर से मिला था उसके आखिरी दिनों में; एक हट्टे-कट्टे नौजवान को ठठरी बना देखा था मैंने।
भारी माहौल बदलने के लिए मैंने पूछा, “अब क्या करते हो, कहाँ हो आजकल?”
“आपको याद है सर, एक पिद्दी-सा लड़का होता था हमारी क्लास में ?”
“अनिल...तुम लोग बहुत परेशान करते थे उसे..”
“जी, पुलिस में है वह, उसने बहुत मदद की सर, पहले एक ट्रक वाले के पास ड्राइवर लगा दिया, वहीं से सिलसिला जमा और अब तो मेरे पास अपने तीन ट्रक हैं। ऑल इंडिया परमिट है, घूमता ही रहता हूँ ।”
“चलो अच्छा है, शादी ?”
“कर ली सर, दो बच्चियाँ हैं ..”
घर-परिवार की बात से पहली बार उसके चेहरे से तनाव की रेखाएँ कुछ हलकी हुईं, “अब देखने को सब ठीक-सा ही है, पैसा भी कमा लिया है, मगर घुमंतू ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है सर, परिवार दिल्ली में, मैं कभी बंगलौर, कभी पटना .. आज आगरा से अमृतसर का माल लेके दिल्ली से गुजर रहा हूँ मगर यहाँ बच्चों से मिलने नहीं जा सका ... ।“
धूप गाढ़ी हो आई थी, मै निकलना भी चाह रहा था और शिव की व्यथा-कथा खिंचती जा रही थी। उसे विराम देने के लिए मैंने खड़े होकर कहा, “अच्छा, खुश रहो शिव, अब मैं चलूँ।”
“हाँ सर, आप मेरी वजह से लेट हो गए।” मैंने देखा वह बैठे-बैठे कुछ कहने-न-कहने के असमंजस में था। मुझे लगा फिर कोई बात से बात निकल आई तो .. तो मैं सचमुच लेट हो जाऊँगा।
तभी उसने मेरे पैर पकड़ लिए और बच्चे की तरह सिसकने लगा ... और मोटे-मोटे आँसू मेरे पैरों पर बरसने लगे।
सुबकता हुआ बोला, “मैं तो आप से माफ़ी माँगने के काबिल भी नहीं हूँ सर, हो सके तो ... “ आँखें मेरी भी गीली हो आईं। किसी तरह उसे उठाकर गले लगाया, और लौट आया।
अब पता नहीं कहाँ होगा शिवचरण ...? . . . . .
©डॉ सुरेश पंत
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