Thursday, 6 March 2014

पेट का मरीज हूँ इसलिए स्वस्थ हूँ


अच्छी सेहत का राज़ : पेट का मरीज होना
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१९७६ में आपातकाल घोषित होने से कुछ पहले की बात है | दिल्ली सरकार की “साहित्यकला परिषद” ने मुझे नवोदित नाटककार के रूप में सम्मानित किया था और मेरे मित्र बलवंत मनराल को कहानीकार के रूप में | हमारे लिए विशेष गर्व की बात यह थी कि सुप्रसिद्ध लेखक और वरिष्ठ नाटककार विष्णु प्रभाकर को और पंजाबी, हिंदी लोकतत्त्व के मर्मज्ञ देवेंद्र सत्यार्थी जी को भी हमारे साथ ही सम्मानित किया गया था |
पुराना सचिवालय में सरकारी समारोह के बाद के कुछ दिनों में दिल्ली की अनेक साहित्यकार संस्थाओं ने हम लोगों के लिए अभिनन्दन कार्यक्रम रखे थे | ऐसा ही एक आयोजन सरोजिनीनगर में उत्तराखंडी मित्रों के द्वारा रखा गया था जिसमें हम चारों उपस्थित थे |
देवेंद्र सत्यार्थी जी वयोवृद्ध थे। टैगोरनुमा सफ़ेद दाढ़ी से ढका हुआ अद्भुत तेजोमय सौम्य मुखमंडल। विष्णु जी तब कोई चौसठ-पैंसठ वर्ष के रहे होंगे, मुझसे लगभग तीस साल बड़े| इकहरा कद, भव्य मुखमंडल और चेहरा सुर्ख गुलाबी | मंच की औपचारिकताओं के बाद चाय पीते हुए मैंने विष्णु प्रभाकर जी से पूछा, “आपके अच्छे स्वास्थ्य का रहस्य क्या है ?”
सरल-सी मुस्कान के साथ उत्तर मिला, “देखो भाई, तीन कारण हैं : एक– मैं सुबह घर से निकलकर पूरे राजघाट की सैर करता हूँ, ५-६ किलोमीटर, दो– शाकाहारी हूँ और तीन– पेट का मरीज़ हूँ !”
आखिरी बात पर चकित होकर मैंने पूछने की हिम्मत की. “भाई साहब, तीसरी बात समझ में नहीं आई |”
वे उसी सादगी से बोले, “ यही तो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है | पेट का मरीज हूँ इसलिए खान-पान में परहेज रखता हूँ !” और फिर ठहाके।
आज सोचता हूँ, कितनी सटीक बात थी उनकी| अधिकांश बीमारियाँ खान-पान की बदपरहेज़ी से ही तो जनमती हैं |

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