Tuesday, 14 October 2025

तालिबान


शब्दों में समय के साथ धीरे-धीरे अर्थ विस्तार और अर्थ संकोच होना सामान्य भाषिक प्रक्रिया है, जो लोकप्रयोग से धीरे-धीरे होती है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि रातोंरात किसी शब्द का अर्थविस्तार हो जाए; जैसे 'तालिबान' के साथ हुआ है। 
अरबी मूल के शब्द तालिब का मूल अर्थ है तलाश करने वाला, खोजी, ढूँढ़ने वाला, जिसे किसी इल्म की तलब हो, विद्यार्थी। तालिब का बहुवचन तालिबान अर्थात विद्यार्थी गण। यह शब्द मूल रूप से पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के इस्लामी मदरसों में पढ़ने वाले अफ़गान छात्रों के समूह के लिए प्रयुक्त नाम था, जो आगे चलकर अफ़ग़ानिस्तान में एक कट्टरपंथी इस्लामी राजनीतिक आंदोलन के रूप में उभरा। इसलिए तालिबान शब्द का मूल अर्थ खो गया और इसे कट्टर इस्लामी आतंकवाद से जोड़ दिया गया। इसे तालिबान का पहला अर्थ विस्तार कहा जा सकता है।
अफ़गानिस्तान की कट्टरवाद समर्थक तालिबान सरकार को रूस के अतिरिक्त विश्व की किसी भी सरकार ने मान्यता प्रदान नहीं की है। भारत ने भी अफगानिस्तान से अपने कूटनीतिक संबंध समाप्त कर लिये। औपचारिक संबंध न रहते हुए भी अचानक अचानक हुई राजनीतिक सरगर्मियों के परिणाम स्वरूप अफगानिस्तान के विदेश मंत्री के साथ तालिबानी प्रतिनिधि मंडल के भारत आने पर तालिबान शब्द भी फिर से मुख्य धारा में आ गया। 
कल तक जिसे गाली के स्तर का अपमानजनक शब्द माना जाता था, वही अब शिष्ट-संभ्रांत विशेषण बन गया।
देर-सवेर शब्दों की भी तकदीर बदलती तो है।

Monday, 11 August 2025

गर्भनाल, पान का बीड़ा और बेड़ई रोटी

गर्भनाल, पान का बीड़ा और बेड़ई रोटी
गर्भनाल umbilical cord को संस्कृत में उल्ब नाल (गर्भाशय की झिल्ली से जुड़ी नाल) कहा जाता है। हरियाणवी भाषा में उल्ब नाल का ही अपभ्रंश रूप है ओरनाल (उल्ब नाल >उर्ब नाल> ओरनाल)।

कुमाउँनी में गर्भनाल को कहा जाता है– नलबीड़ी। कुछ सोचा कि यहाँ बीड़ी कहाँ से आई। इस 'बीड़ी' का संबंध पीने वाली बीड़ी से भी है, कैदियों वाली बेड़ी से भी और बेड़ई रोटी या कचोरी से भी।

संस्कृत में एक धातु है √वेष्ट लपेटने, घेरने के अर्थ में। बेड़ (घेरा), बेड़ा (आँगन), बेड़ई (भीतर से कुछ पिट्ठी आदि भरकर लपेटी हुई), बेड़ी (कैदी अपराधी को बाँधने वाली) बीड़ी (तंबाकू आदि को लपेटकर बाँधी हुई) आदि शब्द इसी वेष्टन से बने हैं।
पान का बीड़ा हो या धूमपान की बीड़ी हो, बने सब लपेटने से ही हैं। इसलिए आपस में रिश्तेदार हैं।

तो नलबीड़ी की बीड़ी की व्युत्पत्ति भी इसी वेष्टन पर टिकी है। नलबीड़ी का अर्थ होगा गर्भस्थ शिशु को लपेटने वाली या उससे लिपटी हुई गर्भनाल।

Wednesday, 2 July 2025

क्राइस्ट और घी

क्राइस्ट और घी का कनेक्शन 
🏺 ✟ ✡ 
घृत की व्युत्पत्ति है- √घृ सेके छादने च, (लेप करना, अभिषेक करना, चुपड़ना, चमकाना to annoint, rub, moisten, shine) + क्त प्रत्यय।
क्राइस्ट शब्द ग्रीक ख्रिस्टोस> लैटिन क्रिस्टस से है जिसका अर्थ है अभिषिक्त, anointed one। क्राइस्ट शब्द का संबंध है पुराभारोपीय मूल √*घॄइ से (from PIE root *ghrei- "to rub" – Online Etymological Dictionary).
भारत की तरह प्राचीन यूनान में भी विशेष अवसरों पर, जैसे राज्याभिषेक आदि, सुगंधित तेल या घी से अभिषेक करने की, छिड़ककर पवित्र करने, उसे शरीर पर लगाकर उसे चमकाने, कांतिमान बनाने की प्रथा थी। पुराणों में एक अप्सरा का और दुर्गा का घृताची नाम मिलता है जिसका अर्थ है घी से अभिषिक्त, घी जैसी स्निग्ध। 
सो ग्रीक या लैटिन व्युत्पत्ति के अनुसार क्राइस्ट का अर्थ होगा "Anointed One" अर्थात घृताभिषिक्त। 
यह टिप्पणी आपको दूर की कौड़ी बुझाना जैसी लग सकती है किंतु भारत से लेकर यूरोप तक दोनों महाद्वीपों की अधिकांश भाषाओं का मूल स्रोत एक ही है। इसलिए उन सबको भारोपीय भाषा परिवार कहा जाता है। हम जब देशभक्ति के आवेश में कहते हैं कि विश्व की सारी भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं तो यह विचारना भूल जाते हैं कि आखिर संस्कृत भी तो कहीं, किसी से विकसित हुई होगी। इसलिए भाषा वैज्ञानिकों ने इन सभी भाषाओं के प्रकल्पनात्मक स्वरूप PIE (पुरा-भारोपीय) को माना जिससे एशिया और यूरोप की अधिकांश भाषाएँ विकसित हुईं।

Monday, 23 June 2025

काला-गोरा


रंग आधारित भेदभाव क्या मानव स्वभाव में है? 
'बुरी नज़र वाले का मुँह काला' ही क्यों? 
'अपराधियों की काली सूची' क्या काले कागज़ पर छपती है?
काले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं। क्या दिलवाले काले दुर्लभ होते हैं?
हमारे अनेक देवी-देवता काले रंग के हैं। भारतीय भी गोरे नहीं, साँवले या ताँबई रंग के माने जाते हैं। फिर भी काले के प्रति हमारी ऐसी भावना क्यों?

भारत में रंगभेद का अपना अलग ही स्वरूप है। लिंगभेद से जुड़कर यह और भयानक हो जाता है। विदेशी रंगभेद से भारतीय रंगभेद इस अर्थ में भी में अलग है कि विदेशों में काले रंग का भेदभाव स्त्री और पुरुष दोनों के साथ समान रूप से होता है परंतु भारत में काले या साँवलेपन को खासतौर से स्त्रियों के सदंर्भ में देखा जाता है। भारतीय समाज में लड़कियों के लिये साँवला रंग किसी शारीरिक अपंगता जैसा ही बड़ा अभिशाप है।

केरल की मुख्य सचिव शारदा मुरलीधर की भांति यह कहने का साहस बहुत कम महिलाएँ जुटा पाती हैं, " हाँ, मैं काली हूँ। काला रंग गोरे से सात गुना सुंदर है।
इस कुमाउँनी लोकगीत में, जिसकी भाषा भोजपुरी लगती है, रंगभेद को बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। बारात आई तो लड़की ने कहीं से छिपकर दूल्हे को देख लिया। साँवले दूल्हे को देखकर लड़की उदास है। पिता से शिकायत करती है तो उसे समझाया जाता है कि दूल्हा वास्तव में साँवला नहीं है। माघ के पाले में और जेठ की धूप में चलकर आया, इसलिए मौसम की मार से साँवला लगता है। और बेटी, मथुरा में श्रीकृष्ण और गया में गदाधर (विष्णु) भी तो साँवले थे। इसलिए पछतावा क्यों—

"बाबुल, हम गोरी बर साँवरो।
बेटी, बर आयो माघ तुषारी में 
बेटी, बर आयो जेठ का घाम में 
बेटी, या गुन बर तेरो साँवरो ।
बेटी, मत करो मन में पछतावनो 
बेटी, मथुरा में श्रीकृष्ण साँवरो।
बेटी, गया में गदाधर साँवरो।"

Thursday, 29 May 2025

घर-घर सिंदूर

नई भारतीय संस्कृति में सिंदूरी सोच 
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ऑपरेशन सिंदूर के पूर्व से ही भारतीय सांस्कृतिक शब्दावली में सिंदूर का विशेष महत्त्व रहा है। शैव, शाक्त, वैष्णव, सनातन धाराओं के अतिरिक्त बौद्ध और जैन धर्म में तथा तंत्र-मंत्र साधना आदि में भी सिंदूर का बहुत उपयोग होता है। गणेश, भैरव, हनुमान जी की मूर्तियों में सिंदूर का नित्य लेपन होता है। दुर्गा के विविध स्वरूपों में सिंदूर चढ़ाया जाता है और दुर्गा पूजा में लोग एक-दूसरे पर सिंदूर फेंकते हुए उल्लास मनाते हैं।
सिंदूर को सौभाग्य द्रव्य माना जाता है। विवाह के कर्मकांड में सिंदूरदान की एक अनिवार्य रस्म होती है जिसके अनुसार सप्तपदी के बाद पति नवोढा की माँग में पहली बार सिंदूर भरता है। उसके बाद सौभाग्यवती स्त्रियाँ आजीवन अपनी माँग में इससे शृंगार करती हैं। सिंदूर से भरी माँग किसी विवाहिता के सधवा होने का जीवंत प्रमाण पत्र है जो लोकस्वीकृत है। 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के काशीखंड में कहा गया है कि पति की दीर्घायु की इच्छा रखने वाली पतिव्रताएँ 'सिंदूर को दूर' न करें। "भर्त्तुरायुष्यमिच्छन्ती दूरयेन्न पतिव्रता॥” 
भारतीय समाज में यह मान्यता इतनी दृढ़ है कि पति ही सिंदूर दे सकता है और उसके नाम की सिंदूरदानी कभी दूर नहीं की जाती, मर जाने पर भी चिता तक साथ जाती है।
ये सब पौराणिक-सांस्कृतिक बातें हैं और लोकमान्य हैं। अब नई भारतीय संस्कृति के विशेष मर्मज्ञ और व्याख्याता प्रत्येक घर-परिवार में सिंदूर पहुँचाने की बात कर रहे हैं! क्या यह विवाहिताओं का अपमान नहीं है कि उन्हें कहा जाए कि वे किसी और का दिया हुआ सिंदूर पहनें? और क्या विवाहित पुरुष यह सहन कर लेंगे कि उनकी पत्नी को कोई और सिंदूरदान करे? 
अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी और को सिंदूर देने का काम कोई ढीठ असामाजिक तत्व ही कर सकता है और कोई कायर ही होगा जो अपने जीते जी देखे कि उसकी पत्नी को कोई और सिंदूर दे रहा है। 
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Wednesday, 28 May 2025

इराज या ईरज

'इराज' की हलचल
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किसी नवजात शिशु का क्या नाम रखा जाए, यह उसके माता-पिता का प्रथम और परम अधिकार है तथा परिवार का आंतरिक मामला। इसलिए मैं नाम के बारे में पूछे गए प्रश्नों को टाल दिया करता हूँ। आज 'इराज' नाम सोशल मीडिया पर छाया हुआ है और अनेक मित्रों ने मुझे टैग किया है और डीएम से पूछ रहे हैं।
क्योंकि 'इराज' ने एक राजनीतिक घराने में जन्म लिया है, इसलिए लोग इस नाम को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियाँ कर रहे हैं। कुछ तो इसे फ़ारसी और उर्दू का नाम बताकर मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ रहे हैं। ट्रोलों की बात का उल्लेख व्यर्थ है। हाँ, लालू जी का हवाला देकर किसीने लिखा है कि नवजात ने मंगलवार को जन्म लिया इसलिए इराज नाम रखा गया क्योंकि यह हनुमान का नाम है।
इराज को हनुमान जी से कैसे जोड़ा गया है, यह मैं नहीं जानता। इतना अवश्य है कि यह संस्कृत का नाम है। इरा, इला, इळा, इडा (=पृथ्वी, सुरा, वाणी, जल आदि) समान हैं और वैदिक काल से एक नाम की चारों वर्तनियाँ प्रचलित हैं। संस्कृत भाषा के दो प्रसिद्ध कोश शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम् में हलायुध को उद्धृत किया गया है और उसके अनुसार 'इरा' से जन्मा इराज, कामदेव का नाम है। (इरया मद्येन जायते इति इराज: कन्दर्पः )। आप्टे और मोनियर विलियम्स के कोश में भी इराज (इरा+ज= इरा से जन्मा) का अर्थ कामदेव दिया गया है। भूमिपुत्र, पृथ्वीपुत्र, वाणी पुत्र, जलज इत्यादि इराज के पर्याय हो सकते हैं। मंगल को भी पृथ्वी का पुत्र माना गया है।
संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान और नामार्थ विचारक नित्यानंद मिश्र ने एक दूसरी दिशा की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया है। प्रेरणा और गति के अर्थ में संस्कृत में एक धातु है ईर्। ईर् से अच् प्रत्यय जोड़ने पर बनता है ईर अर्थात पवन, वायु। ईरज (ईर+ज) का अर्थ पवन पुत्र हनुमान होगा। अंग्रेजी भाषा की रोमन वर्तनी ने ईरज (Iraj) को इराज बना दिया।
जन्म लेते ही बच्चों के नाम ने इतनी हलचल मचा दी है तो आशा की जा सकती है कि आगे वह अपने कार्यों से भी हलचल मचा कर प्रसिद्ध होगा।
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Saturday, 24 May 2025

कटहल कथा

शाकाहारियों का मांसाहार: जैकफ्रूट

एक नया शब्द मिला 'गाछपाठा'। गाछ संस्कृत गच्छ से बना है जिसका अर्थ है पेड़। और पाठा कहा जाता है बकरी के बच्चे को। गाछ पाठा अर्थात गाछ पर लगा हुआ पाठा। शाकाहारियों का बकरा। 
नामकरण का कारण क्या रहा होगा? शाकाहार में मांसाहार की कल्पना या मांसाहार न मिलने की विवशता में शाकाहारी संतोष? या शाकाहारियों पर कटाक्ष? मानना पड़ेगा कि ऊँचे गाछ पर लगे बड़े-से फल को 'पाठा' कहना ऊँची कल्पना तो है। धर्म भ्रष्ट भी न हो और स्वाद सुख भी मिले।
संस्कृत में कटहल को कण्टकी फल, कण्टकफल, कण्टाफल कहा जाता है। कण्टकफल से कटहल। इसका दूसरा नाम रोचक है- पनसफल। स्तुति या व्यवहार के लिए पन धातु है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार "पनाय्यते स्तूयतेऽनेन देवः मनुष्यादिर्वेति। यद्वा पनायति स्तौति सन्तोषयतीत्यर्थः देवमनुष्यादीन् इति"। अर्थात जिस फल के द्वारा देवता या मनुष्य को प्रसन्न करने के लिए स्तुति की जाए या जो देवताओं और मनुष्यों को प्रसन्न करे, वह है पनसफल। वाचस्पत्यम् में एक दूसरी दिशा पकड़ी गई है। पन्यते स्तूयतेऽसौ वृक्षेषु उत्तमफलत्वात् वृहत्फलत्वाद्वा, अर्थात उत्तम और बड़ा फल होने के कारण वृक्षों में जिसकी प्रशंसा की जाती है वह पनसफल। 
आयुर्वेद के ग्रंथों में कटहल की बड़ी प्रशंसा पाई जाती है। भाव प्रकाश ने इसके अनेक स्वास्थ्य वर्धक लाभ बताए हैं। 
कण्टाफलं सुमधुरं वृंहणं स्निग्धशीतलम् । 
दुर्जरं वातपित्तध्नं श्लेष्मशुक्रवलप्रदम् । 
तदेव सर्पिषा युक्तं स्निग्धं हृद्यं बलप्रदम् । 
[वलप्रद= ऊर्जा देने वाला, बलप्रद= शक्ति देने वाला]
अंग्रेजी में इसे जैकफ्रुट कहा जाता है और जैकफ्रूट शब्द अंग्रेजी को मलयालम से मिला है। हुआ यों कि कटहल को मलयालम में चक्का कहा जाता है। पुर्तगाली केरल क्षेत्र में आए तो चक्का पुर्तगाली में बन गया जैका (jaca)। पुर्तगाली नाम में अंग्रेजों का फ्रूट भी जुड़ा तो बन गया जैकफ्रूट।
कटहल को दक्षिण भारत का मूल निवासी माना जाता है। केरल और अन्य दक्षिणी राज्यों में इसकी खेती का लंबा इतिहास रहा है। प्राचीन तमिऴ के संगम साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है। पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि भारत में कटहल की खेती 3,000-6,000 साल पहले से की जाती रही है। इसके बीसियों व्यंजन बनते हैं और इसे बड़े चाव से खाया जाता है।
एक रोचक बात और, यों कटहल से अनेक रोचक बातें जुड़ी हुई हैं। आमतौर पर समूचे दक्षिण भारत में और विशेष कर तमिलनाडु में कच्चा कटहल नहीं खाया जाता। आमतौर पर कोई जानता भी नहीं कि कच्चे कटहल का स्वाद कैसा होता है। सभी जातियों के लोग कटहल के पके बीजों को चाव से खाते हैं। उसके अनेक व्यंजन प्रचलित हैं।
(चित्र सौजन्य: @wikicommons)
शाकाहारियों को यह तो नहीं पता कि मांस का स्वाद कैसा होता है, लेकिन यह सब मानते हैं की किसी पाक कला विशेषज्ञ के द्वारा बड़े मन से बनाई गई कटहल की सब्जी की महक मोहक होती है और खाने वाला, शाकाहारी हो अथवा मांसाहारी, बड़े चाव से खाता है। 

Friday, 28 March 2025

मनीष और मनीषा

मनीष का सच 🤗
क्या कभी गौर किया है कि हिंदी में और अन्य भारतीय भाषाओं में भी मनीष नाम बहुत प्रचलित है किंतु ऋषिकेश की ही भाँति यह मनीष भी व्याकरण सिद्ध नहीं है, लोक सिद्ध है। आप यदि शब्दकोश में ढूँढ़ें तो आपको मनीषा, मनीषी तो मिलेंगे लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि मनीष कहीं नहीं मिलेगा।
संस्कृत में मन अनेकार्थी है। पूजा, आदर करने के अर्थ में मन् धातु से मनस् (मन्यतेऽनेन) से मन बनता है।  मन से निर्मित अनेक शब्द संस्कृत ,हिंदी तथा अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में हैं — सुमन, दुर्मन, मानस ,मनस्वी, मनोहर आदि। मन के अनेक अर्थों में प्रमुख हैं— हृदय, समझ, प्रत्यक्षज्ञान, प्रज्ञा,चेतना, निर्णय या विवेचन की शक्ति ।
अभी एक और घटक रह गया - ईषा। ईषा कहते हैं हल के उस भाग को जिसमें नीचे फाल लगा होता है और ऊपर से नियंत्रित करने के लिए हत्था। ईषा के बिना खुदाई नहीं हो सकती खेती के लिए खेत तैयार नहीं हो सकता।
मनीषा शब्द इसी मनस् (मन) और ईषा से व्युत्पन्न हुआ है। गीता में भगवान कृष्ण ने माना है कि मन को नियंत्रित करना कठिन है। भाषा में भी मन के साथ जब ईषा जुड़ती है तभी कुछ सार्थक काम हो सकता है। मनीषा अर्थात मनसः ईषा (मन की प्रज्ञा, बुद्धि जो उसे नियंत्रण में रखती है)। मनीषा का कोशगत अर्थ है मन की वह विशेष शक्ति जिससे वह विचार आदि करता है। गंभीर चिंतन करने की मानसिक शक्ति मनीषा कहलाती है। इसे चाह, कामना, प्रज्ञा, समझ, सोच, बुद्धि, मति, चेतना इत्यादि भी कहा गया है। मनीषा स्त्रीलिंग नाम है इसलिए लड़कियों के नाम के लिए बहुत सार्थक और लोकप्रिय शब्द है। मनीषा से विशेषण बनता है मनीषी। मनीषा जिसमें है वह मनीषी अर्थात ज्ञानी, बुद्धिमान, विद्वान।
अनेक भाषाओं में जहाँ पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्द अलग-अलग नहीं हैं , वहाँ पुल्लिंग शब्द को मूल मानकर उसके साथ कोई प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग बना लिया जाता है। हिंदी में स्त्रीलिंग बनाने के लिए अनेक प्रत्यय हैं किंतु तत्सम शब्दों के हिंदी स्त्रीलिंग बनाने के लिए अधिकतर आ तथा ई प्रत्यय जोड़ते हैं। दूसरे शब्दों में आ और ई से अंत होने वाले अधिकतर तत्सम शब्द स्त्रीलिंग होते हैं।
हिंदी में भी प्राय: मूल पुल्लिंग शब्दों से स्त्रीलिंग बना लिए जाते हैं, किंतु मनीषा स्त्रीलिंग के संदर्भ में मनीष पुलिंग के अस्तित्व की की संभावना नहीं है। यह अपवाद है! यहाँ शब्द निर्माण का क्रम पुल्लिंग से स्त्रीलिंग नहीं, मूल मनीषा (स्त्रीलिंग) से मनीष (पुल्लिंग) बना लिया गया है। मनीष उन गिने-चुने शब्दों में से है जो संस्कृत व्याकरण को अंँगूठा दिखाते हुए हिंदी में हैं और हिंदी के हैं।
अब आप यह नहीं कह सकते कि हिंदी पुरुष प्रधान भाषा है।

Saturday, 22 March 2025

नाम तो नाम है

यशस्वी भव 
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नाम तो नाम है। आवश्यक नहीं है कि नाम सदा सार्थक हो, या नाम वाला यथा नाम तथा गुण हो, लेकिन ऐसा हो जाए तो सोने में सुहागा। '-वाला' के अर्थ में संस्कृत का मतुप् प्रत्यय रूप रचना में वान्/मान् दिखाई पड़ता है; जैसे रूपवान्, वित्तवान्, आयुष्मान्, श्रीमान्।
जिसके पास पर्याप्त धन है (धनमस्य अस्तीति) वह धनवान (धन+मतुप्)। इसी प्रकार जिसके पास बहुत यश है, जो यशस्वी (यश+विनि) है, वह यशोवान्।
श्रीमंत की तर्ज़ पर हिंदी ने अपने शब्द बना लिए हैं— धनवंत, कुलवंत, यशवंत, जसवंत । यह बात और है कि धनवंत भिखारी का नाम भी हो सकता है और यशवंत किसी बदनाम व्यक्ति का भी। 
यह बदनामी भी अजीब शै है। किसी को भी चिपट जाती है। सितारे गर्दिश में हों तो भले-भले इसके चंगुल में फंस जाते हैं। कहते हैं भगवान कृष्ण को भी चोरी की बदनामी झेलनी पड़ी थी। बदनामी वह गर्हित या निंदनीय लोकचर्चा है जो समाज में विपरीत धारणा फैलाने के लिए होती है।

एक कहावत भी तो है : बदनाम भी होंगे तो क्या नाम नहीं होगा। 

 हमें तो ताहिर फ़राज़ का यह शेर याद आ रहा है—
जेल से वापस आकर उसने पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ी
मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई!
ख़ुदा करे बदनामी ख़त्म हो। 
आमीन 🤲
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Wednesday, 19 March 2025

आदिम गंध

आदिम गंध
•••
महवे-सी मस्त 
मदमाती-महकती-थरथराती धरती 
ओढ़ लेगी 
किसी फागुनी शाम को टेसुई ओढ़नी 
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध तन-मन पर, 
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे 
उतरती साँझ का काजल आँज लेगी
और चल देगी 
छनकती-छमकती 
कल-कल, छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ...
#
थम जाएगी पुरवा
रातभर मचलेगा शिराओं में तूफ़ान 
गर्म साँसों के साथ पिघलकर 
सियरा जाएगा लावा 
बार-बार ...
भोर की बेला 
लजा जाएँगे पूरब के ललछौंहे गाल 
और भी गुलाबी हो जाएँगे 
दौड़ पड़ेगा बादल का टुकड़ा 
सूरज की आँखें मींचने 
कि 'बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से'... पसीना-पसीना हो जाएगी लुटी-थकी हवा 
भाग जाएगी 
आदिम गंध को समेटे 
अपने आँचल में... ....!
(रचना: १९८६)

Sunday, 9 February 2025

शल, शौल, साही

🦔साही, शौल🦔
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कुमाउँनी-गढ़वाली में साही (porcupine) के लिए प्रचलित शब्द सौल, शौल, शौव, शौलु को संस्कृत 'शल/शल्लक' से व्युत्पन्न मानें। शलली शल के काँटे को भी कहा जाता है, शल को भी।
श्वावित् शल का पर्याय है। श्वानं विध्यतीति श्वावित्। 
जो अपने काँटों से श्वान (कुत्ते) को भी मार दे, वह श्वावित।
"श्वावित्तु शल्यस्तल्लोम्नि शलली शललं शलम्"। (अमर:) 
श्वावित् वह पशु है जिसके लोम (रोएँ) शल्य (काँटे) के हों । उसके नाम शलली, शलल और शल भी हैं।

शल्य का अर्थ है काँटा, कुरेदने -फाड़ने वाला कोई उपकरण।महाभारत युद्ध में महारथी कर्ण के सारथी का नाम शल्य था। कहते हैं इसका कारण यह था कि वह कर्ण के सामने उसकी वीरता का बखान करते-करते एक तड़का अवश्य लगा लेता था कि यों तो आप बलवान हैं, किंतु अर्जुन में एक विशेषता यह भी है...! यह बात कर्ण को काँटे जैसी चुभती थी, इसलिए शल्य यथा नाम तथा गुण था।

शल के लिए हिंदी में प्रचलित साही, सेही, सेई संस्कृत 'सेधा' से हैं। सेधा > सेधी > साही/सेही/सेई।
साही के काँटे की यज्ञोपवीत‌ और विवाह के समय आवश्यकता होती थी। मिथिला में यज्ञोपवीत में इसे वटुक की शिखा में लपेटा जाता है और विवाह में सिन्दूर देने के पहले इससे कन्या की माँग दो भागों में बाँटकर कोरी जाती है। कुमाऊँ में भी यज्ञोपवीत संस्कार के समय वटुक के द्वारा जाने अनजाने अभक्ष-भक्षण के दोष को दूर करने के लिए सौलकान (शल का काँटा) नाभि में चुभाया जाता था।
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