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महवे-सी मस्त
मदमाती-महकती-थरथराती धरती
ओढ़ लेगी
किसी फागुनी शाम को टेसुई ओढ़नी
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध तन-मन पर,
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे
उतरती साँझ का काजल आँज लेगी
और चल देगी
छनकती-छमकती
कल-कल, छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ...
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थम जाएगी पुरवा
रातभर मचलेगा शिराओं में तूफ़ान
गर्म साँसों के साथ पिघलकर
सियरा जाएगा लावा
बार-बार ...
भोर की बेला
लजा जाएँगे पूरब के ललछौंहे गाल
और भी गुलाबी हो जाएँगे
दौड़ पड़ेगा बादल का टुकड़ा
सूरज की आँखें मींचने
कि 'बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से'... पसीना-पसीना हो जाएगी लुटी-थकी हवा
भाग जाएगी
आदिम गंध को समेटे
अपने आँचल में... ....!
(रचना: १९८६)
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