Wednesday, 19 March 2025

आदिम गंध

आदिम गंध
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महवे-सी मस्त 
मदमाती-महकती-थरथराती धरती 
ओढ़ लेगी 
किसी फागुनी शाम को टेसुई ओढ़नी 
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध तन-मन पर, 
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे 
उतरती साँझ का काजल आँज लेगी
और चल देगी 
छनकती-छमकती 
कल-कल, छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ...
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थम जाएगी पुरवा
रातभर मचलेगा शिराओं में तूफ़ान 
गर्म साँसों के साथ पिघलकर 
सियरा जाएगा लावा 
बार-बार ...
भोर की बेला 
लजा जाएँगे पूरब के ललछौंहे गाल 
और भी गुलाबी हो जाएँगे 
दौड़ पड़ेगा बादल का टुकड़ा 
सूरज की आँखें मींचने 
कि 'बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से'... पसीना-पसीना हो जाएगी लुटी-थकी हवा 
भाग जाएगी 
आदिम गंध को समेटे 
अपने आँचल में... ....!
(रचना: १९८६)

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