मनीष का सच 🤗
क्या कभी गौर किया है कि हिंदी में और अन्य भारतीय भाषाओं में भी मनीष नाम बहुत प्रचलित है किंतु ऋषिकेश की ही भाँति यह मनीष भी व्याकरण सिद्ध नहीं है, लोक सिद्ध है। आप यदि शब्दकोश में ढूँढ़ें तो आपको मनीषा, मनीषी तो मिलेंगे लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि मनीष कहीं नहीं मिलेगा।
संस्कृत में मन अनेकार्थी है। पूजा, आदर करने के अर्थ में मन् धातु से मनस् (मन्यतेऽनेन) से मन बनता है। मन से निर्मित अनेक शब्द संस्कृत ,हिंदी तथा अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में हैं — सुमन, दुर्मन, मानस ,मनस्वी, मनोहर आदि। मन के अनेक अर्थों में प्रमुख हैं— हृदय, समझ, प्रत्यक्षज्ञान, प्रज्ञा,चेतना, निर्णय या विवेचन की शक्ति ।
अभी एक और घटक रह गया - ईषा। ईषा कहते हैं हल के उस भाग को जिसमें नीचे फाल लगा होता है और ऊपर से नियंत्रित करने के लिए हत्था। ईषा के बिना खुदाई नहीं हो सकती खेती के लिए खेत तैयार नहीं हो सकता।
मनीषा शब्द इसी मनस् (मन) और ईषा से व्युत्पन्न हुआ है। गीता में भगवान कृष्ण ने माना है कि मन को नियंत्रित करना कठिन है। भाषा में भी मन के साथ जब ईषा जुड़ती है तभी कुछ सार्थक काम हो सकता है। मनीषा अर्थात मनसः ईषा (मन की प्रज्ञा, बुद्धि जो उसे नियंत्रण में रखती है)। मनीषा का कोशगत अर्थ है मन की वह विशेष शक्ति जिससे वह विचार आदि करता है। गंभीर चिंतन करने की मानसिक शक्ति मनीषा कहलाती है। इसे चाह, कामना, प्रज्ञा, समझ, सोच, बुद्धि, मति, चेतना इत्यादि भी कहा गया है। मनीषा स्त्रीलिंग नाम है इसलिए लड़कियों के नाम के लिए बहुत सार्थक और लोकप्रिय शब्द है। मनीषा से विशेषण बनता है मनीषी। मनीषा जिसमें है वह मनीषी अर्थात ज्ञानी, बुद्धिमान, विद्वान।
अनेक भाषाओं में जहाँ पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्द अलग-अलग नहीं हैं , वहाँ पुल्लिंग शब्द को मूल मानकर उसके साथ कोई प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग बना लिया जाता है। हिंदी में स्त्रीलिंग बनाने के लिए अनेक प्रत्यय हैं किंतु तत्सम शब्दों के हिंदी स्त्रीलिंग बनाने के लिए अधिकतर आ तथा ई प्रत्यय जोड़ते हैं। दूसरे शब्दों में आ और ई से अंत होने वाले अधिकतर तत्सम शब्द स्त्रीलिंग होते हैं।
हिंदी में भी प्राय: मूल पुल्लिंग शब्दों से स्त्रीलिंग बना लिए जाते हैं, किंतु मनीषा स्त्रीलिंग के संदर्भ में मनीष पुलिंग के अस्तित्व की की संभावना नहीं है। यह अपवाद है! यहाँ शब्द निर्माण का क्रम पुल्लिंग से स्त्रीलिंग नहीं, मूल मनीषा (स्त्रीलिंग) से मनीष (पुल्लिंग) बना लिया गया है। मनीष उन गिने-चुने शब्दों में से है जो संस्कृत व्याकरण को अंँगूठा दिखाते हुए हिंदी में हैं और हिंदी के हैं।
अब आप यह नहीं कह सकते कि हिंदी पुरुष प्रधान भाषा है।
Friday, 28 March 2025
मनीष और मनीषा
Saturday, 22 March 2025
नाम तो नाम है
यशस्वी भव
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नाम तो नाम है। आवश्यक नहीं है कि नाम सदा सार्थक हो, या नाम वाला यथा नाम तथा गुण हो, लेकिन ऐसा हो जाए तो सोने में सुहागा। '-वाला' के अर्थ में संस्कृत का मतुप् प्रत्यय रूप रचना में वान्/मान् दिखाई पड़ता है; जैसे रूपवान्, वित्तवान्, आयुष्मान्, श्रीमान्।
जिसके पास पर्याप्त धन है (धनमस्य अस्तीति) वह धनवान (धन+मतुप्)। इसी प्रकार जिसके पास बहुत यश है, जो यशस्वी (यश+विनि) है, वह यशोवान्।
श्रीमंत की तर्ज़ पर हिंदी ने अपने शब्द बना लिए हैं— धनवंत, कुलवंत, यशवंत, जसवंत । यह बात और है कि धनवंत भिखारी का नाम भी हो सकता है और यशवंत किसी बदनाम व्यक्ति का भी।
यह बदनामी भी अजीब शै है। किसी को भी चिपट जाती है। सितारे गर्दिश में हों तो भले-भले इसके चंगुल में फंस जाते हैं। कहते हैं भगवान कृष्ण को भी चोरी की बदनामी झेलनी पड़ी थी। बदनामी वह गर्हित या निंदनीय लोकचर्चा है जो समाज में विपरीत धारणा फैलाने के लिए होती है।
एक कहावत भी तो है : बदनाम भी होंगे तो क्या नाम नहीं होगा।
हमें तो ताहिर फ़राज़ का यह शेर याद आ रहा है—
जेल से वापस आकर उसने पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ी
मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई!
ख़ुदा करे बदनामी ख़त्म हो।
आमीन 🤲
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Wednesday, 19 March 2025
आदिम गंध
आदिम गंध
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महवे-सी मस्त
मदमाती-महकती-थरथराती धरती
ओढ़ लेगी
किसी फागुनी शाम को टेसुई ओढ़नी
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध तन-मन पर,
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे
उतरती साँझ का काजल आँज लेगी
और चल देगी
छनकती-छमकती
कल-कल, छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ...
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थम जाएगी पुरवा
रातभर मचलेगा शिराओं में तूफ़ान
गर्म साँसों के साथ पिघलकर
सियरा जाएगा लावा
बार-बार ...
भोर की बेला
लजा जाएँगे पूरब के ललछौंहे गाल
और भी गुलाबी हो जाएँगे
दौड़ पड़ेगा बादल का टुकड़ा
सूरज की आँखें मींचने
कि 'बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से'... पसीना-पसीना हो जाएगी लुटी-थकी हवा
भाग जाएगी
आदिम गंध को समेटे
अपने आँचल में... ....!
(रचना: १९८६)
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