Saturday, 18 April 2026

लेजू

लेजू से बाँधी सौत ...

ब्रजभाषा के एक शब्द का उल्लेख हमारे एक विद्वान मित्र ने किया है— "लेजू"। लेजू की व्युत्पत्ति संस्कृत के "रज्जु" (=रस्सी,rope) से है; //र// को सहज ही//ल// हो जाता है। [संस्कृत- रज्जु, मागधी प्राकृत- लेज्जु, हिंदी- लेजुर, लेजु] ब्रज में कुँवे से पानी खींचने वाली रस्सी को भी लेजू कहा जाता है।
(Photo courtesy: @creativecommons)
रहीम के एक बरवै में इस शब्द का मनोरम प्रयोग देखा जा सकता है:
"घरौ भरौ धरि सीस पै, बिरही देखि लजाइ।
कूक कंठ तें बाँधि के, लेजू लै ज्यों जाइ॥"
सिर पर घड़ा लिए बिरहिन ने अपने नायक को देखा तो उसके पीछे-पीछे यों खिंची चली गई जैसे वह लेजू से बाँधकर ले जा रहा हो।

"लेजू" (रज्जु) को लेकर एक लोकगीत ब्रज क्षेत्र की महिलाओं में विशेष रूप से प्रचलित है जिसमें पतिदेव को तो नाड़े से बाँधा गया है, लेकिन सौत को रस्सी से। ऐसा दंड विधान जो कोमल भी है और कठोर भी!
रे, लेजू से बाँधी मैंनें सौत
नाड़े से बाँध्यौ बालमा।
नीची-नीची डोलै मेरी सौत,
ऊँची अटारी चढ़ै बालमा।"

लोकगीतों की अदभुत व्यंजना शक्ति के ये अनुपम उदाहरण हैं।

Saturday, 4 April 2026

याहू!

 शम्मी कपूर की फिल्म "जंगली" में उसके इस गाने से "याहू" शब्द बड़ा प्रसिद्ध हुआ था। 
"याहू!
चाहे कोई मुझे जंगली कहे,
कहने दो जी कहता रहे,
हम प्यार के तूफ़ानों में घिरे हैं–
हम क्या करें!
याहू!"
गाने के बीच शम्मी कपूर "याहू!" ऐसे झटके में कहता है कि प्रत्येक सुनने-देखने वाला चौंकता है। फ़िल्म में याहू शब्द समझ में आए, चाहे न आए, उसकी प्रस्तुति से अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि वह एक उत्साह बढ़ाने वाला नारा या सफलता की एक चीख है। 

वस्तुत: याहू अरबी भाषा से आया हुआ शब्द है। रेख़्ता शब्दकोश के अनुसार याहू ईश्वर को संबोधित करता हुआ एक शब्द, ईश्वर का एक नाम है– "हे ईश्वर!" फ़क़ीरों, कलन्दरों योगियों, संतों और तपस्वियों आदि का नारा जो वे ईश्वर की याद में लगाते हैं। कबूतरों की एक प्रजाति कबूतर-ए-याहू कहलाती है जिसके बारे में यह विश्वास है कि इनकी आवाज़ 'याहू' ध्वनि से मिलती है।
जनाब हैदर अली आसिफ़ साहब का एक शेर है–े
दिल-लगी अपनी तिरे ज़िक्र से किस रात न थी
सुब्ह तक शाम से या-हू के सिवा बात न थी

Thursday, 2 April 2026

खरी कमाई का सहारा…

#सच्ची_बात : एक संस्मरण

पडोसी ने ऑफिस जाते हुए वर्दी में ही दरवाज़े पर दस्तक दी और दरवाज़ा खुलते ही बोले, "शर्मा जी, . . .₹ की ज़रूरत आन पड़ी है, मैं पहली के बाद लौटा दूँगा."

'शर्मा जी' भीतर गए और उलटे पाँव लौटकर रकम हाथ में रख दी. 

वादे के मुताबिक वे पहली की शाम को ही आ पहुँचे. तसल्ली से बैठे. औपचारिक मिज़ाज पुर्सी के बाद बोले, "आपका धन्यवाद करने आया हूँ." कहते हुए उन्होंने रकम मेज़ पर रख दी और थोड़ा मुस्कुराकर कहने लगे, " आपने तो उस दिन यह भी नहीं पूछा कि क्यों चाहिए, चुपचाप दे दिए!"

"वह आपका निजी मामला था, मैं क्यों पूछता। हाँ, मैं कुछ और पूछना चाहता था."

"तो अब पूछिए न", उन्होंने चाय का कप उठाते हुए कहा.

"भाई, आप पुलिस महकमे में हैं और भगवान की कृपा से ताम-झाम भी ठीक-ठाक है. फिर भी आपके पास इतनी छोटी रकम न रही हो, यह मानने का मन नहीं हुआ."

"बिलकुल ठीक कहा आपने, सर. घर पर पैसे थे, लेकिन बच्चे की बोर्ड परीक्षा की फ़ीस भरी जानी थी और मेरी पसीने की कमाई के पैसे कम पड़ रहे थे, सो आपकी खरी कमाई का सहारा ज़रूरी था!"

मैं मौन था. मानव मन की भी कितनी परतें होती हैं!