ब्रजभाषा के एक शब्द का उल्लेख हमारे एक विद्वान मित्र ने किया है— "लेजू"। लेजू की व्युत्पत्ति संस्कृत के "रज्जु" (=रस्सी,rope) से है; //र// को सहज ही//ल// हो जाता है। [संस्कृत- रज्जु, मागधी प्राकृत- लेज्जु, हिंदी- लेजुर, लेजु] ब्रज में कुँवे से पानी खींचने वाली रस्सी को भी लेजू कहा जाता है।
रहीम के एक बरवै में इस शब्द का मनोरम प्रयोग देखा जा सकता है:
"घरौ भरौ धरि सीस पै, बिरही देखि लजाइ।
कूक कंठ तें बाँधि के, लेजू लै ज्यों जाइ॥"
सिर पर घड़ा लिए बिरहिन ने अपने नायक को देखा तो उसके पीछे-पीछे यों खिंची चली गई जैसे वह लेजू से बाँधकर ले जा रहा हो।
"लेजू" (रज्जु) को लेकर एक लोकगीत ब्रज क्षेत्र की महिलाओं में विशेष रूप से प्रचलित है जिसमें पतिदेव को तो नाड़े से बाँधा गया है, लेकिन सौत को रस्सी से। ऐसा दंड विधान जो कोमल भी है और कठोर भी!
रे, लेजू से बाँधी मैंनें सौत
नाड़े से बाँध्यौ बालमा।
नीची-नीची डोलै मेरी सौत,
ऊँची अटारी चढ़ै बालमा।"
लोकगीतों की अदभुत व्यंजना शक्ति के ये अनुपम उदाहरण हैं।
वाह ।
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