Thursday, 2 April 2026

खरी कमाई का सहारा…

#सच्ची_बात : एक संस्मरण

पडोसी ने ऑफिस जाते हुए वर्दी में ही दरवाज़े पर दस्तक दी और दरवाज़ा खुलते ही बोले, "शर्मा जी, . . .₹ की ज़रूरत आन पड़ी है, मैं पहली के बाद लौटा दूँगा."

'शर्मा जी' भीतर गए और उलटे पाँव लौटकर रकम हाथ में रख दी. 

वादे के मुताबिक वे पहली की शाम को ही आ पहुँचे. तसल्ली से बैठे. औपचारिक मिज़ाज पुर्सी के बाद बोले, "आपका धन्यवाद करने आया हूँ." कहते हुए उन्होंने रकम मेज़ पर रख दी और थोड़ा मुस्कुराकर कहने लगे, " आपने तो उस दिन यह भी नहीं पूछा कि क्यों चाहिए, चुपचाप दे दिए!"

"वह आपका निजी मामला था, मैं क्यों पूछता। हाँ, मैं कुछ और पूछना चाहता था."

"तो अब पूछिए न", उन्होंने चाय का कप उठाते हुए कहा.

"भाई, आप पुलिस महकमे में हैं और भगवान की कृपा से ताम-झाम भी ठीक-ठाक है. फिर भी आपके पास इतनी छोटी रकम न रही हो, यह मानने का मन नहीं हुआ."

"बिलकुल ठीक कहा आपने, सर. घर पर पैसे थे, लेकिन बच्चे की बोर्ड परीक्षा की फ़ीस भरी जानी थी और मेरी पसीने की कमाई के पैसे कम पड़ रहे थे, सो आपकी खरी कमाई का सहारा ज़रूरी था!"

मैं मौन था. मानव मन की भी कितनी परतें होती हैं!

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