Monday, 27 May 2024

भक्त, अंधभक्त और चमचा-चमची

भक्त √भज् (भजन करना) से बना है। भक्त भगवान के होते हैं जो ईश्वर में समर्पण का भाव रखते हैं। अपने आराध्य देवी-देवता को स्नान , शृंगार , पूजा, भोग लगाने के बाद ही स्वयं भोजन करते हैं तथा आरती, आराधना, पाठ, स्तोत्र-भजनों के द्वारा आराध्य का गुणगान करते हैं किंतु अपना दैनंदिन काम भी विवेक के अनुसार करते रहते हैं। भक्त भात को भी कहा जाता है। भात अर्थात पका हुआ चावल जो पुनः धान या चावल नहीं बन सकता।

अंधभक्त अपने आराध्य में कोई बुराई देख ही नहीं सकता। उसके गलत काम के लिए भी उसे समर्थन देता है और उसके लिए गाली-गलौच ही नहीं, लड़ने-भिड़ने को तत्पर रहता है। दरअसल उसे लगता ही नहीं कि उसका आराध्य कोई गलत काम कर सकता है। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आराध्य के किसी काम से लोक का या उसका अपना अहित हो रहा हो। वह आँख बंद करके कहता है कि "उन्होंने" किया है तो ठीक ही किया होगा।

 वडनेरकर जी ने बताया चमचा संस्कृत चमस् से है। लाक्षणिक अर्थ में कोई चमचा केवल तभी तक किसी व्यक्ति की तारीफ़ करता है और उसके पीछे लगा रहता है, जब तक कि उसे उससे कुछ फ़ायदा होता है या काम सिद्ध होने की उम्मीद रहती है। जहाँ उसका स्वार्थ सिद्ध नहीं होता या सिद्ध होने की संभावना नहीं रहती, वहीं पर चमचा आश्रय या सुविधा देने वाले का साथ छोड़ देता है..।

व्याकरण की दृष्टि से चमचा पुल्लिंग है और चम्मच भी। कुमाउँनी में चम्मच स्त्रीलिंग है। हिंदी में लिंग निर्धारण करते हुए कभी-कभी आकार और उपयोग में जो बड़ा होता है और अधिक काम करने में समर्थ होता है उसे पुल्लिंग माना जाता है। इस आधार पर कुमाउँनी में चम्मच आकार और उपयोगिता में छोटी या कमतर होने से स्त्रीलिंग है। लाक्षणिक अर्थ में जब प्रयोग किया जाता है तो लिंग निर्धारण का सिद्धांत भिन्न हो जाता है। चमचागिरी करने वाला पुरुष तो चमचा ही कहा जाएगा, किंतु चमचागीरी करने वाली महिला चम्मची नहीं, चमची कहलाएगी। दूसरे शब्दों में घटक द्रव्य के अनुसार चमचा या चम्मच धातु या काठ आदि से निर्मित होते हैं और चमची हाड़-मास से। मुँह लगना या मुँहलगा होना दोनों की विशेषता है।
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Tuesday, 21 May 2024

चायमहिमा

॥चायदिवसे चायमहिमा॥
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(पन्तोपाह्व सुरेश:)
न त्वहं कामये लक्ष्मीं प्रोन्नतिं वा महत्पदम्।
त्रिसन्ध्यं चषके चायं काॅफीम्वा यच्छ हे प्रभो !
धनं मास्तु यशो मास्तु तत्किञ्चिन्नैव रोचते।
चायं देह्यथवा कॉफीम्त्रिवारं तु दिने दिने॥
रोगशोकादिशमनं श्रमखेदहरं तथा। 
चायपानं सदा कुर्यात् त्रिसंध्यं श्रद्धयान्वितः।
सत्ये अमृतपानं स्यात् त्रेतायां सोमपानकम्।
द्वापरे गोरसं श्रेष्ठं चाय-कॉफी कलौयुगे ॥
चायपानसमं किञ्चित्पानं नास्ति महीतले।
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खं नैवोपजायते।
कात्यायनो महर्षिश्च एवमूचे हि वार्त्तिके
 पठितं भविता सर्वै: 'समाहारे चायमिष्यते'।।
(Photo courtesy: Wikicommons)