Friday, 25 October 2024
मुरजबंध शब्द (Palindrome Words)
Sunday, 20 October 2024
करवा चौथ के बहाने
करवा चौथ के बहाने
•••••••
किसी ने कल पूछा था कुमाऊँ पहाड़ में सुहाग के लिए मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्व बनाम करवा चौथ पर। तो भद्रमुखो और सुमुखियो, इस थीम का पुराना ठेठ पहाड़ी लोक पर्व तो सातूँ-आठूँ (गौरा, गमरा) पर्व था जो कुमाऊँ के अलावा पड़ोसी नेपाल में भी मनाया जाता रहा है। इस पर्व की खासियत यह भी है की इसमें पंडिताई-पुरोहिताई, दान-दक्षिणा का कोई स्कोप नहीं था। शुद्ध लोक पर्व! गाँव की चार महिलाएँ खेत में जाकर घास से गौरा महेश बनाकर डलिया में रखकर लातीं , निर्धारित घर में उन्हें स्थापित कर दिया जाता और मिलकर उनकी पूजा करतीं , बड़ी-बूढ़ी आमाएँ बिणभाट या गँवरा की लोक कथा सुनातीं, बाकी "हो बलऽ हो बलऽ" कहकर हुंकारा भरतीं। उसी आँगन में पूजा के बाद और शाम को भी फुर्सत होने पर 'खेल' लगाए जाते, लोकगीत, लोक नृत्य होते। दो-चार दिन उत्सव मना कर उन डलियों को फिर से सिर में रहकर घास-फूस की मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता। गणेश पूजा या दुर्गा पूजा की भाँति न अपद्रव्य फैलने की चिंता, न पर्यावरण प्रदूषण की। प्रकृति से जुटाए पाँच तत्व प्रकृति में ही मिल जाते।
बामण पहाड़ में आने लगे तो उनके साथ उनके रिवाज़ आए। स्वाभाविक है कि रीति रिवाजों काअंतर्मिश्रण भी प्रारंभ हुआ। वे स्थानीय रिवाज़ सातूँ-आठूँ को मानने लगे और पौराणिक पात्र सत्यवान सावित्री को लेकर मनाया जाने वाला उनका एक और पर्व भी साथ में आ गया, बट सावित्री अमूस। ज़रूरी नहीं था कि बट की ही पूजा की जाए, क्योंकि बट पहाड़ में सब जगह नहीं होता। उसके लिए विकल्प खोजे गए कि बड़ का पेड़ न हो तो बड़ की टहनी, नहीं तो आँवले का पेड़ और उसके अभाव में भी आँवले की टहनी की पूजा की जाए। कुछ न मिले तो घर के मंदिर (द्यापतनक् ठ्या) में ही कागज पर सत्यवान सावित्री उकेरकर पूजा कर ली जाए। कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं। हाँ, पंडिताई और दान-दक्षिणा ज़रूर जुड़ गए। यह बाध्यता भी नहीं थी कि प्रत्येक सुहागन सावित्री का व्रत करेगी। यह परंपरा जरूर थी कि एक बार अगर व्रत उठा लिया तो फिर छोड़ा नहीं जाना चाहिए। देखा-देखी ब्राह्मणेतर वर्ग में भी स्वेच्छा से बट सावित्री व्रत चला। आज भी सारे पहाड़ में बट सावित्री नहीं मनाई जाती।
समय बदला। पहाड़ी समाज की देसी (मैदानी ) समाज में और देसी समाज की पहाड़ी समाज में आवत-जावत बढ़ी। आज़ादी के बाद पहाड़ में पंजाबी व्यापारी आ बसे और तराई भाग में पंजाबी किसानों को जमीनें आवंटित हो गईं। तो उनके रीति-रिवाजों से लोग परिचित होने लगे। यह कुछ घरों में, खासकर पंजाबियों के पड़ोसी परिवारों में करवा चौथ के परिचय का दौर था। कुछ नई बहुओं को यह नया पर्व अच्छा लगा। फिर पति के लिए शुभकामना तो कोई भी सुहागन चाहेगी, इसलिए भी इसकी ओर लोग आकर्षित हुए। और करवा चौथ चल पड़ा। यह बात और है कि पहाड़ में तो लोग करवा शब्द को जानते तक नहीं थे क्योंकि पहाड़ में मिट्टी के बर्तन बनाए नहीं जाते। तड़के सरगी खा लेने और दिन भर पानी तक न पीने का चलन इस्लामी रमजान के रोज़े के विधि विधान से प्रभावित था। तो कोई बात नहीं, बाकी लोग तो कर ही रहे थे। हमें तो उनका अनुकरण करना था।
इसके बाद आया एकता कपूर सीरियलों का दौर जिनमें करवा चौथ को ग्लैमराइज कर दिया गया। इस पर बाजारवाद का तड़का लगा और यह पहाड़ी शहरों और कस्बों का भी चहेता पर्व हो गया। इस पर्व को भला-बुरा (भला कम, बुरा ज्यादा) कहने वाले लोग भी मिले लेकिन इससे उत्साह में कमी नहीं आई! आ भी नहीं सकती क्योंकि इस पर्व से नारी की सजने-सँवरने और अपने को आकर्षक दिखाने की सहज मूल प्रवृत्ति भी जुड़ी हुई है। अब यह पंजाब हरियाणा का पर्व नहीं रहा, अखिल भारतीय हो रहा है और धीरे-धीरे वैश्विक भी, क्योंकि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इसे धूम-धाम से मनाते हैं।
समय आगे बढ़ता है। समय के साथ-साथ कुछ पुरानी चीजें छूटती हैं, कुछ नई जुड़ती हैं । अब यदि यह करवा चौथ जुड़ गया है तो नाक-भौंह सिकोड़ने की क्या ज़रूरत है। पर्व ही तो है, खुश रहने का एक बहाना । मनाइए और खुश रहिए।