Friday, 25 October 2024

मुरजबंध शब्द (Palindrome Words)

मुरजबंध (palindrome) 
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बचपन में जब मुरजबंध या पलिंड्रोम जैसे पारिभाषिक शब्दों की जानकारी नहीं थी तो स्कूल से आते-जाते ऐसे शब्दों के खेल खेला करते थे जो उल्टे-सीधे एक समान हों। तब डालडा नया-नया बाज़ार में आया था और बहुत लोकप्रिय उदाहरण था। कभी-कभी तो खेल को थोड़ा कठिन बनाने के लिए पहले घोषणा कर दी जाती थी डालडा कोई नहीं बताएगा।
(चित्र सौजन्य: नभाटा)

वाक्यों में अन्य कुछ थे - 
~सेबक राम मरा कब से। 
~तेजू के बाबा के जूते।
~राधा की बूनी में नीबू की धारा।
~राम लाल का लला मरा।

बहुत बाद में बड़ी कक्षाओं में मालूम हुआ मुरजबंध (palindrome) शब्द वे हैं जो उल्टे-सीधे एक समान बोले-लिखे जा सकते हैं। जैसे: नयन, नवीन, जलज, तप्त, चम्मच, नग्न, डालडा, सरस, जहाज, नमन, नवजीवन, मलयालम, वनमानव, नवभुवन, नववन, कनक, कारिका, बल्ब, रबर इत्यादि। मलयालम MALAYALAM तो हिंदी, अंग्रेजी दोनों का उदाहरण है।

चलिए, फ़्लैशबैक मोड में इस सूची को अपनी जानकारी से खेल-खेल में आगे बढ़ाइए।

Sunday, 20 October 2024

करवा चौथ के बहाने

करवा चौथ के बहाने
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किसी ने कल पूछा था कुमाऊँ पहाड़ में सुहाग  के लिए मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्व बनाम करवा चौथ पर। तो भद्रमुखो और सुमुखियो, इस थीम का पुराना ठेठ पहाड़ी लोक पर्व तो सातूँ-आठूँ (गौरा, गमरा) पर्व था जो कुमाऊँ के अलावा पड़ोसी नेपाल में भी मनाया जाता रहा है। इस पर्व की खासियत यह भी है की इसमें पंडिताई-पुरोहिताई, दान-दक्षिणा का कोई स्कोप नहीं था। शुद्ध लोक पर्व! गाँव की चार महिलाएँ खेत में जाकर घास से गौरा महेश बनाकर डलिया में रखकर लातीं , निर्धारित घर में उन्हें स्थापित कर दिया जाता और मिलकर उनकी पूजा करतीं , बड़ी-बूढ़ी आमाएँ बिणभाट या गँवरा की लोक कथा सुनातीं, बाकी  "हो बलऽ हो बलऽ" कहकर हुंकारा भरतीं। उसी आँगन में पूजा के बाद और शाम को भी फुर्सत होने पर 'खेल' लगाए जाते, लोकगीत, लोक नृत्य होते। दो-चार दिन उत्सव मना कर उन डलियों को फिर से सिर में रहकर घास-फूस की मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता। गणेश पूजा या दुर्गा पूजा की भाँति न अपद्रव्य फैलने की चिंता, न पर्यावरण प्रदूषण की। प्रकृति से जुटाए पाँच तत्व प्रकृति में ही मिल जाते।

 
बामण पहाड़ में आने लगे तो उनके साथ उनके रिवाज़ आए। स्वाभाविक है कि रीति रिवाजों काअंतर्मिश्रण भी प्रारंभ हुआ। वे स्थानीय रिवाज़ सातूँ-आठूँ को मानने लगे और पौराणिक पात्र सत्यवान सावित्री को लेकर मनाया जाने वाला उनका एक और पर्व भी साथ में आ गया, बट सावित्री अमूस। ज़रूरी नहीं था कि बट की ही पूजा की जाए, क्योंकि बट पहाड़ में सब जगह नहीं होता। उसके लिए विकल्प खोजे गए कि बड़ का पेड़ न हो तो बड़ की टहनी, नहीं तो आँवले का पेड़ और उसके अभाव में भी आँवले की टहनी की पूजा की जाए। कुछ न मिले तो घर के मंदिर (द्यापतनक् ठ्या) में ही कागज पर सत्यवान सावित्री उकेरकर पूजा कर ली जाए। कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं। हाँ, पंडिताई और दान-दक्षिणा ज़रूर जुड़ गए। यह बाध्यता भी नहीं थी कि प्रत्येक सुहागन सावित्री का व्रत करेगी। यह परंपरा जरूर थी कि एक बार अगर व्रत उठा लिया तो फिर छोड़ा नहीं जाना चाहिए। देखा-देखी ब्राह्मणेतर वर्ग में भी स्वेच्छा से बट सावित्री व्रत चला। आज भी सारे पहाड़ में बट सावित्री नहीं मनाई जाती।

 
समय बदला। पहाड़ी समाज की देसी (मैदानी ) समाज में और देसी समाज की पहाड़ी समाज में आवत-जावत बढ़ी। आज़ादी के बाद पहाड़ में पंजाबी व्यापारी आ बसे और तराई भाग में पंजाबी किसानों को जमीनें आवंटित हो गईं। तो उनके रीति-रिवाजों से लोग परिचित होने लगे। यह कुछ घरों में, खासकर पंजाबियों के पड़ोसी परिवारों में करवा चौथ के परिचय का दौर था। कुछ नई बहुओं को यह नया पर्व अच्छा लगा। फिर पति के लिए शुभकामना तो कोई भी सुहागन चाहेगी, इसलिए भी इसकी ओर लोग आकर्षित हुए। और करवा चौथ चल पड़ा। यह बात और है कि पहाड़ में तो लोग करवा शब्द को जानते तक नहीं थे क्योंकि पहाड़ में मिट्टी के बर्तन बनाए नहीं जाते। तड़के सरगी खा लेने और दिन भर पानी तक न पीने का चलन इस्लामी रमजान के रोज़े के विधि विधान से प्रभावित था। तो कोई बात नहीं, बाकी लोग तो कर ही रहे थे। हमें तो उनका अनुकरण करना था।


इसके बाद आया एकता कपूर सीरियलों का दौर जिनमें करवा चौथ को ग्लैमराइज कर दिया गया। इस पर बाजारवाद का तड़का लगा और यह पहाड़ी शहरों और कस्बों का भी चहेता पर्व हो गया। इस पर्व को भला-बुरा (भला कम, बुरा ज्यादा) कहने वाले लोग भी मिले लेकिन इससे उत्साह में कमी नहीं आई! आ भी नहीं सकती क्योंकि इस पर्व से नारी की सजने-सँवरने और अपने को आकर्षक दिखाने की सहज मूल प्रवृत्ति भी जुड़ी हुई है। अब यह पंजाब हरियाणा का पर्व नहीं रहा, अखिल भारतीय हो रहा है और धीरे-धीरे वैश्विक भी, क्योंकि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इसे धूम-धाम से मनाते हैं।

 
समय आगे बढ़ता है। समय के साथ-साथ कुछ पुरानी चीजें छूटती हैं, कुछ नई जुड़ती हैं । अब यदि यह करवा चौथ जुड़ गया है तो नाक-भौंह सिकोड़ने की क्या ज़रूरत है। पर्व ही तो है, खुश रहने का एक बहाना । मनाइए और खुश रहिए।

Tuesday, 1 October 2024

गांधी जी को याद करते हुए एक स्याही की याद

सन 1930 -'34 के बीच जब स्वदेशी आंदोलन शिखर पर था तो एक बार महात्मा गांधी के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हुई कि विदेशी चीजों का बहिष्कार करने की बात हम विदेशी स्याही में लिखकर कर रहे हैं। यह तो एक विडंबना है। इसका कोई हल निकल जाना चाहिए। उन्होंने बंगाल के एक क्रांतिकारी सतीश चंद्र दासगुप्त से बात की जिनका संबंध बंगाल केमिकल से था। सतीश चंद्र स्वयं भी स्याही बनाना जानते थे।
बढ़ते-फैलते स्वतंत्रता आंदोलन के कारण अंग्रेजी सरकार को कांग्रेस के नाम पर धोती-कुर्ते से भी चिढ़ हो गई थी। दबाव बनाने के लिए राजशाही विश्वविद्यालय (अब बांग्लादेश) में एक प्रोफेसर नानिगोपाल को प्रशासन के द्वारा धोती-कुर्ता पहनकर विवि आने से मना कर दिया गया तो वे कोलकाता में घर-घर जाकर स्याही बेचने लगे और यह "प्रो.मैत्रेय की स्याही" नाम से प्रसिद्ध हो गई।
 सतीश बाबू ने अपना स्याही बनाने का फार्मूला प्रोफेसर नानी गोपाल को बता दिया। यही प्रोफेसर नानिगोपाल मैत्र और उनके भाई शंकराचार्य मैत्र सुलेखा कंपनी के संस्थापक बने। स्वतंत्रता संघर्ष के युग में गांधीजी से आशीर्वाद प्राप्त कर स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में आई थी सुलेखा। कहते हैं स्वयं महात्मा गांधी ने इस स्याही का नामकरण किया था।
1947 में भारत के स्वतंत्र होने तक अपनी स्थापना के लगभग 12 साल में ही सुलेखा नाम बंगाल में तो घर-घर में प्रसिद्ध हो गया था। अन्यत्र भी इसकी भारी माँग थी।
आज ई-नोट्स, ईमेल, लैपटॉप, एंड्रॉयड के युग में जब कलम-स्याही से लिखना इतिहास हो चुका, लोग पत्र लिखना तक भूल गए, सुलेखा की वापसी चौंकाने वाली है; किंतु कम से कम पिछली दो पीढ़ियाँ सुलेखा को बेहद प्यार करती रही हैं। कभी विद्यार्थियों, लेखकों और अन्य मसिजीवियों की मेज़ की शोभा हुआ करती थी सुलेखा।
आगे Chelpark और Camel भी बहुत प्रसिद्ध हुईं , फिर भी सुलेखा को कुछ लोग प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते थे। कुछ लोगों के लिए सुलेखा "बंग-स्वाभिमानेर प्रतीक" भी थी।
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