सन 1930 -'34 के बीच जब स्वदेशी आंदोलन शिखर पर था तो एक बार महात्मा गांधी के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हुई कि विदेशी चीजों का बहिष्कार करने की बात हम विदेशी स्याही में लिखकर कर रहे हैं। यह तो एक विडंबना है। इसका कोई हल निकल जाना चाहिए। उन्होंने बंगाल के एक क्रांतिकारी सतीश चंद्र दासगुप्त से बात की जिनका संबंध बंगाल केमिकल से था। सतीश चंद्र स्वयं भी स्याही बनाना जानते थे।
बढ़ते-फैलते स्वतंत्रता आंदोलन के कारण अंग्रेजी सरकार को कांग्रेस के नाम पर धोती-कुर्ते से भी चिढ़ हो गई थी। दबाव बनाने के लिए राजशाही विश्वविद्यालय (अब बांग्लादेश) में एक प्रोफेसर नानिगोपाल को प्रशासन के द्वारा धोती-कुर्ता पहनकर विवि आने से मना कर दिया गया तो वे कोलकाता में घर-घर जाकर स्याही बेचने लगे और यह "प्रो.मैत्रेय की स्याही" नाम से प्रसिद्ध हो गई।
सतीश बाबू ने अपना स्याही बनाने का फार्मूला प्रोफेसर नानी गोपाल को बता दिया। यही प्रोफेसर नानिगोपाल मैत्र और उनके भाई शंकराचार्य मैत्र सुलेखा कंपनी के संस्थापक बने। स्वतंत्रता संघर्ष के युग में गांधीजी से आशीर्वाद प्राप्त कर स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में आई थी सुलेखा। कहते हैं स्वयं महात्मा गांधी ने इस स्याही का नामकरण किया था।
1947 में भारत के स्वतंत्र होने तक अपनी स्थापना के लगभग 12 साल में ही सुलेखा नाम बंगाल में तो घर-घर में प्रसिद्ध हो गया था। अन्यत्र भी इसकी भारी माँग थी।
आज ई-नोट्स, ईमेल, लैपटॉप, एंड्रॉयड के युग में जब कलम-स्याही से लिखना इतिहास हो चुका, लोग पत्र लिखना तक भूल गए, सुलेखा की वापसी चौंकाने वाली है; किंतु कम से कम पिछली दो पीढ़ियाँ सुलेखा को बेहद प्यार करती रही हैं। कभी विद्यार्थियों, लेखकों और अन्य मसिजीवियों की मेज़ की शोभा हुआ करती थी सुलेखा।
आगे Chelpark और Camel भी बहुत प्रसिद्ध हुईं , फिर भी सुलेखा को कुछ लोग प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते थे। कुछ लोगों के लिए सुलेखा "बंग-स्वाभिमानेर प्रतीक" भी थी।
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