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नाम तो नाम है। आवश्यक नहीं है कि नाम सदा सार्थक हो, या नाम वाला यथा नाम तथा गुण हो, लेकिन ऐसा हो जाए तो सोने में सुहागा। '-वाला' के अर्थ में संस्कृत का मतुप् प्रत्यय रूप रचना में वान्/मान् दिखाई पड़ता है; जैसे रूपवान्, वित्तवान्, आयुष्मान्, श्रीमान्।
जिसके पास पर्याप्त धन है (धनमस्य अस्तीति) वह धनवान (धन+मतुप्)। इसी प्रकार जिसके पास बहुत यश है, जो यशस्वी (यश+विनि) है, वह यशोवान्।
श्रीमंत की तर्ज़ पर हिंदी ने अपने शब्द बना लिए हैं— धनवंत, कुलवंत, यशवंत, जसवंत । यह बात और है कि धनवंत भिखारी का नाम भी हो सकता है और यशवंत किसी बदनाम व्यक्ति का भी।
यह बदनामी भी अजीब शै है। किसी को भी चिपट जाती है। सितारे गर्दिश में हों तो भले-भले इसके चंगुल में फंस जाते हैं। कहते हैं भगवान कृष्ण को भी चोरी की बदनामी झेलनी पड़ी थी। बदनामी वह गर्हित या निंदनीय लोकचर्चा है जो समाज में विपरीत धारणा फैलाने के लिए होती है।
एक कहावत भी तो है : बदनाम भी होंगे तो क्या नाम नहीं होगा।
हमें तो ताहिर फ़राज़ का यह शेर याद आ रहा है—
जेल से वापस आकर उसने पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ी
मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई!
ख़ुदा करे बदनामी ख़त्म हो।
आमीन 🤲
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