Thursday, 29 May 2025

घर-घर सिंदूर

नई भारतीय संस्कृति में सिंदूरी सोच 
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ऑपरेशन सिंदूर के पूर्व से ही भारतीय सांस्कृतिक शब्दावली में सिंदूर का विशेष महत्त्व रहा है। शैव, शाक्त, वैष्णव, सनातन धाराओं के अतिरिक्त बौद्ध और जैन धर्म में तथा तंत्र-मंत्र साधना आदि में भी सिंदूर का बहुत उपयोग होता है। गणेश, भैरव, हनुमान जी की मूर्तियों में सिंदूर का नित्य लेपन होता है। दुर्गा के विविध स्वरूपों में सिंदूर चढ़ाया जाता है और दुर्गा पूजा में लोग एक-दूसरे पर सिंदूर फेंकते हुए उल्लास मनाते हैं।
सिंदूर को सौभाग्य द्रव्य माना जाता है। विवाह के कर्मकांड में सिंदूरदान की एक अनिवार्य रस्म होती है जिसके अनुसार सप्तपदी के बाद पति नवोढा की माँग में पहली बार सिंदूर भरता है। उसके बाद सौभाग्यवती स्त्रियाँ आजीवन अपनी माँग में इससे शृंगार करती हैं। सिंदूर से भरी माँग किसी विवाहिता के सधवा होने का जीवंत प्रमाण पत्र है जो लोकस्वीकृत है। 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के काशीखंड में कहा गया है कि पति की दीर्घायु की इच्छा रखने वाली पतिव्रताएँ 'सिंदूर को दूर' न करें। "भर्त्तुरायुष्यमिच्छन्ती दूरयेन्न पतिव्रता॥” 
भारतीय समाज में यह मान्यता इतनी दृढ़ है कि पति ही सिंदूर दे सकता है और उसके नाम की सिंदूरदानी कभी दूर नहीं की जाती, मर जाने पर भी चिता तक साथ जाती है।
ये सब पौराणिक-सांस्कृतिक बातें हैं और लोकमान्य हैं। अब नई भारतीय संस्कृति के विशेष मर्मज्ञ और व्याख्याता प्रत्येक घर-परिवार में सिंदूर पहुँचाने की बात कर रहे हैं! क्या यह विवाहिताओं का अपमान नहीं है कि उन्हें कहा जाए कि वे किसी और का दिया हुआ सिंदूर पहनें? और क्या विवाहित पुरुष यह सहन कर लेंगे कि उनकी पत्नी को कोई और सिंदूरदान करे? 
अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी और को सिंदूर देने का काम कोई ढीठ असामाजिक तत्व ही कर सकता है और कोई कायर ही होगा जो अपने जीते जी देखे कि उसकी पत्नी को कोई और सिंदूर दे रहा है। 
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