Saturday, 24 May 2025

कटहल कथा

शाकाहारियों का मांसाहार: जैकफ्रूट

एक नया शब्द मिला 'गाछपाठा'। गाछ संस्कृत गच्छ से बना है जिसका अर्थ है पेड़। और पाठा कहा जाता है बकरी के बच्चे को। गाछ पाठा अर्थात गाछ पर लगा हुआ पाठा। शाकाहारियों का बकरा। 
नामकरण का कारण क्या रहा होगा? शाकाहार में मांसाहार की कल्पना या मांसाहार न मिलने की विवशता में शाकाहारी संतोष? या शाकाहारियों पर कटाक्ष? मानना पड़ेगा कि ऊँचे गाछ पर लगे बड़े-से फल को 'पाठा' कहना ऊँची कल्पना तो है। धर्म भ्रष्ट भी न हो और स्वाद सुख भी मिले।
संस्कृत में कटहल को कण्टकी फल, कण्टकफल, कण्टाफल कहा जाता है। कण्टकफल से कटहल। इसका दूसरा नाम रोचक है- पनसफल। स्तुति या व्यवहार के लिए पन धातु है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार "पनाय्यते स्तूयतेऽनेन देवः मनुष्यादिर्वेति। यद्वा पनायति स्तौति सन्तोषयतीत्यर्थः देवमनुष्यादीन् इति"। अर्थात जिस फल के द्वारा देवता या मनुष्य को प्रसन्न करने के लिए स्तुति की जाए या जो देवताओं और मनुष्यों को प्रसन्न करे, वह है पनसफल। वाचस्पत्यम् में एक दूसरी दिशा पकड़ी गई है। पन्यते स्तूयतेऽसौ वृक्षेषु उत्तमफलत्वात् वृहत्फलत्वाद्वा, अर्थात उत्तम और बड़ा फल होने के कारण वृक्षों में जिसकी प्रशंसा की जाती है वह पनसफल। 
आयुर्वेद के ग्रंथों में कटहल की बड़ी प्रशंसा पाई जाती है। भाव प्रकाश ने इसके अनेक स्वास्थ्य वर्धक लाभ बताए हैं। 
कण्टाफलं सुमधुरं वृंहणं स्निग्धशीतलम् । 
दुर्जरं वातपित्तध्नं श्लेष्मशुक्रवलप्रदम् । 
तदेव सर्पिषा युक्तं स्निग्धं हृद्यं बलप्रदम् । 
[वलप्रद= ऊर्जा देने वाला, बलप्रद= शक्ति देने वाला]
अंग्रेजी में इसे जैकफ्रुट कहा जाता है और जैकफ्रूट शब्द अंग्रेजी को मलयालम से मिला है। हुआ यों कि कटहल को मलयालम में चक्का कहा जाता है। पुर्तगाली केरल क्षेत्र में आए तो चक्का पुर्तगाली में बन गया जैका (jaca)। पुर्तगाली नाम में अंग्रेजों का फ्रूट भी जुड़ा तो बन गया जैकफ्रूट।
कटहल को दक्षिण भारत का मूल निवासी माना जाता है। केरल और अन्य दक्षिणी राज्यों में इसकी खेती का लंबा इतिहास रहा है। प्राचीन तमिऴ के संगम साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है। पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि भारत में कटहल की खेती 3,000-6,000 साल पहले से की जाती रही है। इसके बीसियों व्यंजन बनते हैं और इसे बड़े चाव से खाया जाता है।
एक रोचक बात और, यों कटहल से अनेक रोचक बातें जुड़ी हुई हैं। आमतौर पर समूचे दक्षिण भारत में और विशेष कर तमिलनाडु में कच्चा कटहल नहीं खाया जाता। आमतौर पर कोई जानता भी नहीं कि कच्चे कटहल का स्वाद कैसा होता है। सभी जातियों के लोग कटहल के पके बीजों को चाव से खाते हैं। उसके अनेक व्यंजन प्रचलित हैं।
(चित्र सौजन्य: @wikicommons)
शाकाहारियों को यह तो नहीं पता कि मांस का स्वाद कैसा होता है, लेकिन यह सब मानते हैं की किसी पाक कला विशेषज्ञ के द्वारा बड़े मन से बनाई गई कटहल की सब्जी की महक मोहक होती है और खाने वाला, शाकाहारी हो अथवा मांसाहारी, बड़े चाव से खाता है। 

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