Monday, 3 March 2014

कहाँ होगा शिवचरण

कहाँ   होगा   शिवचरण ?

स्टेट बैंक का लुभावना पद छोड़ कर हम आए अध्यापन के व्यवसाय में, मन में कुछ  जज़्बे, कुछ सपने लिए हुए। एक आग थी कि नया कुछ करेंगे। जीर्ण, जर्जर ढाँचे में घुस जाने के बाद सबकुछ आसान नहीं था। ऐसे में कुछ विद्यार्थियों के चहेते बने, तो कुछ से उलझना भी पड़ा।

एक दिन सुबह ही रिज़र्वेशन कराकर लौट रहे थे अजमेरी गेट की ओर से। एक हट्टा-कट्टा गब्बरसिंह छाप नौजवान, बढ़ी दाड़ी, बिखरे बाल, तहमद लपेटे... अचानक सामने से आकर पैर छुए और हमने यह मानकर कि कभी विद्यार्थी रहा होगा, सर हिलाकर स्वीकारा और आगे बढ़ने की जुगत देखने लगे क्योंकि पैर छूने वाले की काया ने बरामदा करीब-करीब पूरा ही घेर लिया था।

‘’आपने पहचाना नहीं सर’’ , अब भारी आवाज भी गूँजी तो हमने सहज ही कहा, ‘‘भई, पहचाना तो नहीं, उम्र के साथ आपलोग बड़े हो जाते हैं तो शक्ल काफी बदल जाती है।’’
तुरत उसने बताया, “सर, मैं वही हूँ जिसने आपको छुरा दिखाया था ..”

क्षणभर में याद आ गया और मैंने उसे गले लगाकर पूछा, “अरे शिव...,कैसे हो !”
बस, उसने वहीं दीवार के साथ सटकर अपनी राम कहानी शुरू की और पश्चात्ताप के आँसुओं से न केवल खुद भीगा, मुझे भी अंदर तक हिला गया। कहानी भी ऐसी कि कोई एक उपन्यास लिखे तो भी शायद ही पूरी हो।

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उसने चाय वाले को रोक लिया। मैं कुछ कहूँ इससे पहले ही मुझे एक अधटूटी दीवार पर बिठाकर आप नीचे बैठ गया।
“ कुछ और सुनाओ, तुम्हारे माता-पिता कैसे हैं?” मैंने चाय पकड़ते हुए पूछा।
“नहीं रहे सर, मैंने मार दिए दोनों ..”
“क्या कह रहे हो ? ठीक से बताओ।”
“आप घर आए थे तो बीमार माँ को तो आपने भी देखा था। बेटे को बड़ा आदमी बना नहीं सकी और बिगड़े बेटे को झेल नहीं सकी .. और पिताजी उसके मरने के बाद साल भर भी नहीं रहे, मैं उनके लिए भी कुछ नहीं कर पाया।"
"फिर तुम ?"
“मेरा क्या होना था, होश में आने तक बहुत देर हो गई थी सर।"
“और तुम्हारे दोस्त ...?” मुझे मालूम था बड़े संपन्न घरों के दोस्त थे उसके।
“नाम मत लीजिए उनका..  उनके लिए क्या-क्या पंगे नहीं लिए मैंने। आपसे भी उन्हीं के चक्कर में बदतमीज़ी की थी .. “
“इसीलिए पूछ रहा हूँ ..”
“और भी बड़े आदमी बन गए हैं वे, वो प्रभात एक बैंक में बड़ा मनेजर है। प्रेम की कई कंपनियां हैं, लेकिन मिलने गया तो बाहर से ही भगा दिया। मुसीबत में कोई नहीं होता सर..”
“और अशोक ?”
“अशोक ने बुलाया था, कुछ काम देने के लिए भी कहा , लेकिन मुझे लगा कि मेरी रेपुटेशन की वजह से कहीं उसके क्लाइंट ही न कम होने लगें, इसलिए ..”
“सागर और सतवीर तो तुम्हारे दाएँ-बाएँ हाथ थे ..” मैं अतीत की ओर लौट रहा था।
“सागर को एक वारदात में गोली लगी थी सर और सतवीर को किसी ने छुरा भोंक दिया था, एक महीना सफदरजंग हॉस्पिटल में रहा..”

मैंने शिव को नहीं बताया कि हॉस्पिटल में मैं सतवीर से मिला था उसके आखिरी दिनों में; एक हट्टे-कट्टे नौजवान को ठठरी बना देखा था मैंने।

भारी माहौल बदलने के लिए मैंने पूछा, “अब क्या करते हो, कहाँ हो आजकल?”
“आपको याद है सर, एक पिद्दी-सा लड़का होता था हमारी क्लास में ?”
“अनिल...तुम लोग बहुत परेशान करते थे उसे..”
“जी, पुलिस में है वह, उसने बहुत मदद की सर, पहले एक ट्रक वाले के पास ड्राइवर लगा दिया, वहीं से सिलसिला जमा और अब तो मेरे पास अपने तीन ट्रक हैं। ऑल इंडिया परमिट है, घूमता ही रहता हूँ ।”
“चलो अच्छा है, शादी ?”
“कर ली सर, दो बच्चियाँ हैं ..” 

घर-परिवार की बात से पहली बार उसके चेहरे से तनाव की रेखाएँ कुछ हलकी हुईं, “अब देखने को सब ठीक-सा ही है, पैसा भी कमा लिया है, मगर घुमंतू ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है सर, परिवार दिल्ली में, मैं कभी बंगलौर, कभी पटना .. आज आगरा से अमृतसर का माल लेके दिल्ली से गुजर रहा हूँ मगर यहाँ बच्चों से मिलने नहीं जा सका ... ।“

धूप गाढ़ी हो आई थी, मै निकलना भी चाह रहा था और शिव की व्यथा-कथा खिंचती जा रही थी। उसे विराम देने के लिए मैंने खड़े होकर कहा, “अच्छा, खुश रहो शिव, अब मैं चलूँ।”
“हाँ सर, आप मेरी वजह से लेट हो गए।” मैंने देखा वह बैठे-बैठे कुछ कहने-न-कहने के असमंजस में था। मुझे लगा फिर कोई बात से बात निकल आई तो .. तो मैं सचमुच लेट हो जाऊँगा। 
तभी उसने मेरे पैर पकड़ लिए और बच्चे की तरह सिसकने लगा ... और मोटे-मोटे आँसू मेरे पैरों पर बरसने लगे। 
सुबकता हुआ बोला, “मैं तो आप से माफ़ी माँगने के काबिल भी नहीं हूँ सर, हो सके तो ... “ आँखें मेरी भी गीली हो आईं। किसी तरह उसे उठाकर गले लगाया, और लौट आया।

अब पता नहीं कहाँ होगा शिवचरण ...?    .    .    .    .    .    
©डॉ सुरेश पंत

2 comments:

  1. बहुत प्रसन्‍नता हुई जानकर क‍ि आप भाषाव‍ि‍द् ही नहीं कथाकार भी हैं।

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  2. धन्यवाद, सच तो यह है कि मैं कुछ भी नहीं हूँ। समय बिताने के लिए.. "करतब सब मरकट की नाईं"

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