Monday, 3 March 2014

"बोनस में जी रहा हूँ" : भवानीप्रसाद मिश्र

याद आता है भवानी

२० फरवरी, १९८५ को भवानी भाई स्मृतिशेष हुए थे | बहुत याद आते हैं आज भी..

सत्तर के दशक का उत्तरार्ध | संभवतः दो अक्तूबर, 1979 ।  "गांधी-सन्निधि" में भवानीप्रसाद मिश्र के आवास पर ही हम लोगों ने एक काव्यगोष्ठी रखी थी, भवानी भाई के सान्निध्य में | राजनीतिक स्टंटबाज़ी के लिए मशहूर दिल्ली में उस दिन के लिए एक दल विशेष ने घोषणा की थी कि अमुक-अमुक ने राजघाट को अपवित्र कर दिया है, वे लोग समाधि को गंगाजल से धोकर पवित्र करेंगे | राजघाट पर यही नाटक हुआ। प्रातःकाल किसी दल ने श्रद्धांजलि अर्पित की तो फिर दूसरे ने समाधि को गंगाजल से धोने का उपक्रम किया। संघर्ष हुआ, पुलिस ने लाठी चार्ज किया अश्रुगैस छोड़ी और बहुत लोग घायल हुए। गांधी समाधि पर छोटा युद्व और रक्तपात होने के समाचार हमें मिल चुके थे। अगले दिन एक अंग्रेजी अखबार के मुखपृष्ठ पर शीर्षक था:  "लाठीचार्ज, टियरगैस एंड राजनारायन एट राजघाट"

तो ऐसी स्थितियों में कवि गोष्ठी के लिए एकत्र होना अटपटा लग रहा था | पर आज के जैसे संचार माध्यम न होने से आमंत्रित लोगों को रोक पाना संभव नहीं था| लोगों के पास टेलीफ़ोन तक नहीं होते थे | अपराह्न में चार बजे के आसपास हम बीसेक जन, तथाकथित कवि, दिल्ली की अनेक दिशाओं से सन्निधि पहुँचे | 
कुछ ही देर बाद भवानी भाई कमरे में आ गए| गुस्से में लाल तमतमाता चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें डबडबाई हुई | कुछ समझ नहीं आया कि सदा निश्छ्ल हँसी की चाँदनी बिखेरता भव्य मुखमंडल आज ऐसी उग्र मुद्रा में क्यों है | कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ |

बैठते ही बिना किसी औपचारिकता के शुरू हो गए | कुछ इस तरह : ‘ये लोग राजघाट को शुद्ध-पवित्र  करेंगे  ...!  अरे, जिसकी आत्मा पवित्र थी, जिसकी सोच पवित्र थी, जिसने साधनों की पवित्रता पर बल दिया, जो मानवता को पवित्र कर गया, उसकी समाधि को ... ?!  जीते जी तो उस महात्मा को जीने नहीं दिया, सीना छलनी कर दिया, अब उसके मर जाने पर उसकी स्मृति से भी खिलवाड़ ... । सत्य-अहिंसा के लिए जीने वाले की समाधि पर लाठियाँ चलाई गई हैं  ...!'  वे बोलते ही चले गए।

स्पष्ट था कि उस दिन की घटनाओं ने उस समर्पित भावुक योद्धा को भीतर तक आहत कर दिया था| संवेदनशील कवि, चिन्तक, ऐसा गांधीवादी जिसकी हर साँस गांधीमय हो, उसकी वेदना का अनुमान लगाना भी कठिन था | 

भवानी भाई बोलते ही चले गए ..एक-एक शब्द उनकी मर्म वेदना का गवाह था, भावनाओं से भरा | कभी कंठ रुँध जाता पर आवेग था कि रुकता ही न था, मानो कोई शांत पर्वत भीतर घुमड़ रहे लावे को रोक नहीं पा रहा हो| यह संवाद नहीं, एकालाप था जैसे वे अपने आप से बात कर रहे हों।
 
अब एक और चिंता हुई, उन्हें कुछ समय पहले ही दिल का दौरा पड़ चुका था | इतना आवेग, भावावेश चिंताजनक हो सकता था | अनुपम, उंनके सुपुत्र, विशेष रूप से चिंतित थे और उन्हें भीतर ले जाना चाहते थे। सो उनके स्वास्थ्य और हृदयाघात से हाल ही में उबरने की बात का हवाला देते हुए डरते-डरते निवेदन किया गया कि अब बस करें | उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है |
 
उत्तर में भवानी भाई ने जो कहा उसका एक-एक शब्द याद है | बोले, “ अरे भाई, दिल के इतने दौरे पड़ने के बाद मैं तो बोनस में जी रहा हूँ, इसलिए मेरी चिंता न करें और जो आज हुआ है वह क्या मौत से कम है? मुझे न रोकिए, मरने के भय से मैं कैसे चुप रह सकता हूँ  ..”
 
वे तभी थमे जब आवेग कम हुआ | किसी तरह अनुपम उन्हें भीतर ले गए।

गोष्ठी की औपचारिकता हुई, क्योंकि भवानी जी का विशेष आग्रह था कि हम चाय पीकर ही जाएँ।

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