आदिम गंध
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महवे-सी मस्त
मदमाती-महकती-थरथराती धरती
ओढ़ लेगी किसी फागुनी शाम को
टेसुई ओढ़नी
छिड़क लेगी मौलसिरी गंध
तन-मन पर ,
आँज लेगी
दो डबडबाती नीली झीलों के किनारे
उतरती साँझ का काजल और
चल देगी छनकती-छमकती
कल-कल छल-छल पहाडी झरने पर
आकाश से मिलने ... ...
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थम जाएगी पुरवा
रातभर ...
मचलेगा शिराओं में तूफ़ान
पिघलकर सियरा जाएगा लावा ...
भोर की बेला
लजा जाएँगे
पूरब के ललछोंहे गाल
और गुलाबी हो जाएँगे
दौड़ पड़ेगा बादल का एक टुकड़ा
सूरज की ऑंखें मीचने कि
बेशर्म झाँकने न लगे खिड़कियों से
पसीना-पसीना हो जाएगी
लुटी-थकी हवा
भाग जाएगी
आदिम गंध को समेटे अपने आगोश में |
©
फरवरी, २०१३
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